NPK खाद हुई महंगीपश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण दुनिया भर में उर्वरकों की कीमतें बढ़ गई हैं और उनका आयात भी मुश्किल हो गया है. इसका सीधा असर भारत के किसानों पर पड़ रहा है. इस वजह से बाजार में मिलने वाले कॉम्प्लेक्स उर्वरक (NPK) के कई वेरिएंट महंगे हो गए हैं. कंपनियों ने इनकी कीमतें बढ़ाकर लगभग 2250 रुपये से 2450 रुपये प्रति 50 किलो बैग कर दी है. एक बड़ी उर्वरक कंपनी ने मार्केटिंग फेडरेशन को इन्हीं बढ़ी हुई कीमतों पर एनपीके देने की बात कही है. अगर सरकार की तरफ से अतिरिक्त सब्सिडी नहीं दी जाती है, तो किसानों को यही महंगी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
सरकार यूरिया की कीमत को सीधे नियंत्रित करती है, इसलिए इसके दाम स्थिर रहते हैं. इसी तरह डाईअमोनियम फॉस्फेट (DAP) भी एक जरूरी और संवेदनशील उर्वरक है. इसकी कीमत लगभग 1350 रुपये प्रति बैग रखी गई है, जिसे सरकार सब्सिडी देकर नियंत्रित करती है, ताकि किसानों पर ज्यादा बोझ न पड़े. लेकिन बाकी कुछ उर्वरक, जैसे NPK, सरकार के सीधे नियंत्रण में नहीं आते, इसलिए कंपनियां उनकी बढ़ती लागत के कारण कीमतें बढ़ा रही हैं. इसी वजह से कुछ NPK उर्वरकों की कीमत अब बढ़कर लगभग 2450 रुपये प्रति बैग तक पहुंच गई है. खास बात यह है कि इनमें पोषक तत्व (न्यूट्रिएंट) की मात्रा DAP की तुलना में कम होती है, फिर भी ये महंगे हो गए हैं.
उर्वरक उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, एक बड़ी कंपनी ने NPK उर्वरक के 12:32:16 और 10:26:26 वेरिएंट की कीमत लगभग 2450 रुपये प्रति बैग तक तय करने का प्रस्ताव मार्केटिंग फेडरेशनों को भेजा है. कंपनी का कहना है कि कच्चे माल की कीमतें बढ़ने और खरीफ 2026 के लिए तय सब्सिडी (NBS) दरों के आधार पर इससे कम कीमत पर बेचने पर उन्हें नुकसान होगा. सूत्रों के मुताबिक, अमोनिया, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड की कमी के कारण NPK उर्वरकों का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है. इसी वजह से कई फैक्ट्रियां पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पा रही हैं. हालांकि, यूरिया बनाने वाले अधिकतर संयंत्र अभी भी पूरी क्षमता के साथ काम कर रहे हैं.
देश में एनपीके उर्वरकों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. सबसे ज्यादा बिकने वाले एनपीके 20:20:0:13 वेरिएंट की कीमत अलग-अलग कंपनियों और राज्यों में 1800 रुपये से 2250 रुपये प्रति बैग तक पहुंच गई है. कुछ कंपनियों ने इसकी कीमत 2100 से 2250 रुपये प्रति बैग तय की है. भारत में हर साल करीब 400 लाख टन यूरिया, 100 लाख टन डीएपी और 140 लाख टन कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की खपत होती है. फिलहाल सरकार का मुख्य फोकस किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया और डीएपी उपलब्ध कराने पर है. इसी वजह से सरकार इन उर्वरकों के आयात पर विशेष ध्यान दे रही है.
सरकार डीएपी की कीमत 1350 रुपये प्रति बैग पर बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सब्सिडी भी दे रही है, ताकि किसानों पर ज्यादा बोझ न पड़े. लेकिन अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों, जैसे एनपीके, पर ऐसी अतिरिक्त सहायता नहीं मिल रही है. इसी कारण उनकी कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. उर्वरक कंपनियों का कहना है कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण एनपीके उर्वरकों की उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है. उदाहरण के लिए, सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले एनपीके 20:20:0:13 वेरिएंट को बनाने में ही करीब 2400 रुपये प्रति बैग की लागत आ रही है, इसलिए कंपनियां इसकी बिक्री कीमत भी उसी के आसपास रख रही हैं.
उद्योग को अमोनिया और सल्फ्यूरिक एसिड की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है. इन दोनों कच्चे माल की कमी के कारण डीएपी और एनपीके उर्वरकों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है और कई कारखानों को उत्पादन बनाए रखने में मुश्किलें आ रही हैं. उधर, सरकार ने हाल ही में 25 लाख टन यूरिया आयात को मंजूरी दी है. इसके अलावा सरकारी और सहकारी कंपनियों ने करीब 13 लाख टन डीएपी खरीदने की प्रक्रिया भी पूरी कर ली है. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊंची होने के कारण सरकार की सब्सिडी का खर्च भी बढ़ने की संभावना है.
इस बीच कई राज्यों में उर्वरकों की बिक्री के नियम सख्त कर दिए गए हैं. कई जिलों में एक किसान को एक बार में केवल दो या तीन बैग यूरिया या डीएपी ही दिए जा रहे हैं. इसके लिए किसान के नाम पर जमीन होना जरूरी है और खाद खरीदते समय बायोमेट्रिक सत्यापन भी कराना पड़ता है. खाद विक्रेताओं का कहना है कि इस व्यवस्था के कारण किसानों को खाद लेने के लिए बार-बार दुकानों पर आना पड़ रहा है. वहीं, महंगे एनपीके उर्वरकों की तुलना में किसान अभी भी सस्ते डीएपी को ज्यादा पसंद कर रहे हैं.
सरकार अब रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने के लिए नई कार्ययोजना तैयार कर रही है. इस विषय पर हाल ही में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बैठक भी हुई है. सरकार का उद्देश्य उर्वरकों का संतुलित उपयोग बढ़ाना है. हालांकि, खरीफ सीजन शुरू हो चुका है, इसलिए किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है. अगर पर्याप्त उर्वरक समय पर नहीं मिले, तो इसका असर खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है.
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