रासायनिक खाद पर निर्भरता घटाने का रास्ता बनेंगे Bio Fertiliser, FAI के DG ने समझाया गणि‍त

रासायनिक खाद पर निर्भरता घटाने का रास्ता बनेंगे Bio Fertiliser, FAI के DG ने समझाया गणि‍त

जैव उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल से भारत रासायनिक खाद आयात पर निर्भरता घटा सकता है. एफएआई के महानिदेशक सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि संतुलित पोषण मॉडल ही मिट्टी की सेहत और टिकाऊ खेती का रास्ता है.

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रासायनिक खाद पर निर्भरता घटाने का रास्ता बनेंगे Bio Fertiliser, FAI के DG ने समझाया गणि‍तFAI का बायोफर्टिलाइजर के इस्‍तेमाल पर जोर (AI Image)

भारत में खेती को अधिक टिकाऊ बनाने और आयात किए जाने वाली रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने में जैव उर्वरक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि देश में जैव उर्वरकों की क्षमता अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाई है. अगर पोषक तत्वों की जरूरत का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा भी जैव उर्वरकों से पूरा किया जाए तो खेती से निकलने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब 40 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है.

टिकाऊ खेती के लिए संतुलित पोषण पर दिया जोर

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, पोर्ट ब्लेयर में आयोजित ‘एग्रीकल्चरल सस्टेनेबिलिटी के लिए बायो-फर्टिलाइजर्स’ विषयक प्रशिक्षण कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि केवल रासायनिक खादों पर आधारित खेती लंबे समय तक मिट्टी की सेहत को बनाए नहीं रख सकती. उन्‍होंने कहा कि खनिज उर्वरक, जैव उर्वरक और जैविक संसाधनों का संतुलित उपयोग ही खेती की उत्पादकता और मिट्टी की उर्वरता बचाने का वैज्ञानिक तरीका है. उन्होंने बताया कि देश में पिछले छह दशकों से चल रहे दीर्घकालिक उर्वरक प्रयोगों से यह बात साबित हो चुकी है.

उद्योग जगत को तीन मोर्चों पर बढ़ाना होगा काम: चौधरी

सुरेश कुमार चौधरी ने जैव उर्वरक क्षेत्र से जुड़े उद्योगों से उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि निजी और सहकारी क्षेत्र को निवेश बढ़ाकर उत्पादन का दायरा बढ़ाना चाहिए, ताकि किसानों तक इन उत्पादों की पहुंच मजबूत हो सके. साथ ही निर्माण इकाइयों से लेकर किसानों तक गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी है, क्योंकि खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद किसानों का भरोसा कमजोर कर सकते हैं.

'अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग समाधान जरूरी'

उन्होंने कहा कि जैव उर्वरकों को सामान्य रासायनिक खाद की तरह हर जगह एक समान तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इनकी प्रभावशीलता मिट्टी, जलवायु और स्थानीय पारिस्थितिकी पर निर्भर करती है. ऐसे में अलग-अलग इलाकों की जरूरत के अनुसार सूक्ष्मजीव आधारित विशेष फॉर्मूले विकसित करने होंगे. स्थान विशेष के मुताबिक तैयार किए गए उत्पाद ही बेहतर परिणाम दे सकते हैं.

वैज्ञानिकों और उद्योग प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा

चार दिन तक चले इस आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में 15 कंपनियों और संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद प्रणाली के वैज्ञानिक, उर्वरक उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ और सरकारी अधिकारी भी शामिल रहे. कार्यक्रम में टिकाऊ खेती, मिट्टी की गुणवत्ता सुधार और पर्यावरण संरक्षण में जैव उर्वरकों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई.

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