राजमा पोषक गुणों से भरपूर एक दलहनी फसल है जिसे देश के लोग खूब खाना पसंद हैं. खास कर उत्तर भारत के लोगों की तो राजमा चावल पहली पसंद हैं. यही वजह है कि इसकी मांग भी खूब होती है. इसकी बढ़ी हुई मांग को देखते हुए अब देश के मैदानी इलाकों में भी राजमा की खेती होने लगी है. ऐसे में किसानों के लिए इसकी खेती फायदेमंद साबित हो रही है. इस समय खरीफ सीज़न चालू है ऐसे में किसान उचित तरीके से इसकी खेती कर अच्छा उत्पादन और मुनाफा दोनों कमा सकते हैं.
यह मैदानी क्षेत्रों में अधिक उगाया जाता है. राजमा की अच्छी पैदावार हेतु 10 से 27 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान की आवश्यकता पड़ती है. राजमा हल्की दोमट मिट्टी से लेकर भारी चिकनी मिट्टी तक में उगाया जा सकता है. राजमा में प्रजातियां जैसे कि पीडीआर 14, इसे उदय भी कहते है. मालवीय 137, बीएल 63, अम्बर, आईआईपीआर 96-4, उत्कर्ष, आईआईपीआर 98-5, एचपीआर 35, बी, एल 63 एवं अरुण है.
राजमा की खेती के लिए दोमट और हल्की दोमट मिट्टी बेहतर मानी जाती है. पर इसकी खेती में इस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है कि पानी खेत से पानी निकासी की उचित व्यवस्था की गई हो. इसकी बुवाई के लिए खेत को अच्छे से दो से तीन बार कल्टीवेटर से जुताई करके खेत को तैयार किया जाता है. साथ ही इस बात का खास ध्यान देना होता है कि बुवाई के वक्त खेत में पर्याप्त नमी हो. राजमा की बुवाई करने से पहले इसका बीजोपचार करना जरूरी है. इससे बीजों को पर्याप्त नमी मिलती है.
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राजमा की खेती रबी ऋतु में की जाती है अभी इसके लिए उपयुक्त समय है.यह मैदानी क्षेत्रों में अधिक उगाया जाता है.राजमा की अच्छी पैदावार हेतु 10 से 27 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान की आवश्यकता पड़ती है राजमा हल्की दोमट मिट्टी से लेकर भारी चिकनी मिट्टी तक में उगाया जा सकता .
राजमा में प्रजातियां जैसे कि पीडीआर 14, इसे उदय भी कहते है मालवीय 137, बीएल 63, अम्बर, आईआईपीआर 96-4, उत्कर्ष, आईआईपीआर 98-5, एचपीआर 35, बी, एल 63 एवं अरुण है.
राजमा के लिए 120 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस एवं 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर तत्व के रूप में देना आवश्यक है. नेत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय तथा बची आधी नेत्रजन की आधी मात्रा खड़ी फसल में देनी चाहिए. इसके साथ ही 20 किलोग्राम गंधक की मात्रा देने से लाभकारी परिणाम मिलते है। 20 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव बुवाई के बाद 30 दिन तथा 50 दिन में करने पर उपज अच्छी मिलती है.
राजमा में दो या तीन बार सचाई की आवश्यकता पड़ती है. बुआई के 4 सप्ताह बाद पहली सचाई हल्की करनी चाहिए. बाद में सचाई एक माह बाद के अंतराल पर करनी चाहिए खेत में पानी कभी नहीं ठहरना चाहिए.
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