अगस्त में बढ़ेगी यूरिया की मांग (AI- तस्वीर)जुलाई खत्म होने वाला है. बिहार में धान की रोपनी करीब 65 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है. लेकिन अभी राज्य के कई जिलों में धान की रोपनी लक्ष्य की तुलना में बहुत कम हुई है. हालांकि, कमजोर मॉनसून के बीच भी पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष धान की रोपनी में तेजी है. लेकिन अब जैसे ही अगस्त का महीना शुरू होगा, तो एक ओर किसानों के सामने धान की रोपनी पूरी करने की चुनौती होगी. वहीं दूसरी ओर, अगात धान की खेती कर चुके किसानों को यूरिया की जरूरत होगी. इन तमाम चीजों के बीच सरकार की जिम्मेदारी बढ़ने वाली है. किसानों को यूरिया उपलब्ध कराना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होगी.
बता दें कि कृषि विभाग की ओर से अगस्त महीने में यूरिया की खपत को देखते हुए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध होने की बात कही गई है. कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक (शस्य उपादान) बृजकिशोर ने 'किसान तक' से बातचीत के दौरान बताया कि 28 जुलाई तक यूरिया की जरूरत 4 लाख 79 हजार 354 मीट्रिक टन थी, जबकि 4 लाख 57 हजार 817 मीट्रिक टन उपलब्ध है. वहीं, उन्होंने किसानों से अपील की कि जरूरत के अनुसार ही उर्वरकों का उपयोग करें. क्योंकि ऐसा देखने को मिलता है कि किसान देखा-देखी में अधिक यूरिया का उपयोग खेतों में करते हैं.
कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, हाल के समय में खाद का स्टॉक पर्याप्त है. वहीं, राज्य के कई ऐसे जिले हैं, जहां यूरिया का स्टॉक मांग की तुलना में अधिक है. इनमें पूर्णिया, मुंगेर, कैमूर, औरंगाबाद, अररिया, लखीसराय, बक्सर, भागलपुर, रोहतास, खगड़िया, भोजपुर, शेखपुरा, कटिहार, किशनगंज, जमुई, नवादा, दरभंगा और सारण सहित कुल करीब 18 जिले शामिल हैं, जहां 28 जुलाई तक यूरिया की उपलब्धता मांग की तुलना में अधिक है. जबकि बचे 20 जिलों में जितनी यूरिया की जरूरत है, उसके अपेक्षा उपलब्धता कम है.
रोहतास जिले के किसान अर्जुन सिंह कहते हैं कि उन्हें अपनी फसल में यूरिया के छिड़काव के लिए दुकान या किसी समिति के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह पहले ही यूरिया खरीद चुके हैं. उनके जैसे कई ऐसे किसान हैं जो पहले ही यूरिया का भंडारण अपने यहां कर चुके हैं. हालांकि, वह इस बात से भी सहमत हैं कि बहुत से ऐसे किसान हैं, जो यूरिया के लिए दुकानों के चक्कर लगा रहे हैं.
एक ओर जहां सरकार यूरिया के पर्याप्त भंडारण की बात कह रही है, लेकिन कई जिलों में यूरिया का स्टॉक जरूरत की तुलना में कम होने की वजह से ऐसे इलाकों में यूरिया की किल्लत की संभावना बन सकती है. अब देखना होगा कि जैसे-जैसे धान की रोपनी खत्म होती है और किसान यूरिया की मांग करना शुरू करते हैं, तो सरकार उनकी जरूरत को किस तरह से पूरा करती है.
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