Popcorn farming: सिनेमाहॉल का पॉपकॉर्न हुआ देसी, विदेशी आयात छोड़ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा भारत 

Popcorn farming: सिनेमाहॉल का पॉपकॉर्न हुआ देसी, विदेशी आयात छोड़ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा भारत 

भारतीय सिनेमाघरों में बिकने वाला पॉपकॉर्न अब पूरी तरह 'देसी' और आत्मनिर्भर हो चुका है. पहले जहां थिएटरों के लिए महंगा विदेशी माल इम्पोर्ट करना पड़ता था, वहीं आज भारतीय बाजार में घरेलू पॉपकॉर्न का दबदबा है. यह बड़ा बदलाव सरकारी संस्थानों द्वारा तैयार किए गए नए स्वदेशी हाइब्रिड बीजों, आधुनिक सीड प्लांटर्स और ड्रोन जैसी हाई-टेक खेती की वजह से आया है.इस आधुनिक तकनीक की मदद से सेंट्रल इंडिया के किसानों की लागत घटी हैऔर सही बाजार व्यवस्था मिलने से उनकी कमाई बढ़ी है, जिससे देश तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है.हालांकि, इस शानदार कामयाबी के बावजूद इस सेक्टर में अभी भी कई चुनौतियाँ हैं, जिनसे निपटने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

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Popcorn farming: सिनेमाहॉल का पॉपकॉर्न हुआ देसी, विदेशी आयात छोड़ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा भारत देशी पॉपकॉर्न की बढ़ी डिमांड,घटा आयात

आज के समय में अगर सिनेमा का असली मज़ा लेना हो, तो लोग थिएटर में पॉपकॉर्न खाना कभी नहीं भूलते. सच कहें तो पॉपकॉर्न के बिना फिल्म देखने का अनुभव अधूरा सा लगता है. पिछले एक दशक में भारतीय पॉपकॉर्न मार्केट में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव आया है. साल 2014-15 में जो घरेलू बाजार सिर्फ 50,000 टन का था, वह आज साल 2025-26 बढ़कर 1.30 लाख टन पर पहुंच चुका है. एक वक्त था जब भारत में सिर्फ कर्नाटक का कम फूलने वाला पॉपकॉर्न मिलता था, या फिर सिनेमाघरों के लिए बाहर से महंगा माल इम्पोर्ट करना पड़ता था.लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है; बाजार में घरेलू पॉपकॉर्न की हिस्सेदारी 30% से सीधे बढ़कर 65% हो गई है. इसका पूरा श्रेय आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित व कठिन इलाकों सहित सेंट्रल इंडिया के मेहनती किसानों को जाता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि साल 2030 तक यह बाजार 1.80 लाख टन तक पहुंच जाएगा, जिससे विदेशों से होने वाले आयात में भारी कमी आएगी और हमारे देश के लगभग 810 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत होगी.

सुपरहिट हुआ पापकार्न स्वदेशी हाइब्रिड

यह बदलाव एक दिन में नहीं आया, बल्कि इसके पीछे 'गौरमेट पॉपकॉर्निका' जैसी कंपनियों की कड़ी मेहनत है. एक दशक पहले हमारे सिनेमाघरों में सिर्फ विदेशी पॉपकॉर्न बिकता थाऔर भारत का अपना उत्पादन न के बराबर था. भारतीय किसानों की ज़रूरतों और बाजार की मांग को पूरा करने के लिए, सरकारी कृषि संस्थान (ICAR-IIMR) के साथ मिलकर एक बड़ा कदम उठाया गया. वैज्ञानिकों ने भारत के लोकल और अमेरिकी पॉपकॉर्न की बेहतरीन खूबियों को आपस में मिलाकर नए हाइब्रिड बीज तैयार किए। इस तालमेल ने इस बिजनेस की बरसों पुरानी समस्या को हमेशा के लिए खत्म कर दिया. अब ऐसा मक्का उग रहा है जो खेतों में किसानों के लिए भी फायदेमंद है और मार्केट में ग्राहकों की उम्मीदों पर भी खरा उतरता है. खेती को और आसान व आधुनिक बनाने के लिए कंपनियों ने खेतों में ट्रैक्टर, आधुनिक सीड प्लांटर्स और ड्रोन से कीटनाशकों के छिड़काव जैसी हाई-टेक तकनीकों की शुरुआत की है, जिससे किसानों की लागत घटी है और कमाई बढ़ी है.

स्मगलिंग और अंडर-इनवॉइसिंग की चुनौतियां

गौरमेट पॉपकॉर्निका कंपनी के अनुसार इस शानदार तरक्की और लोगों के बीच बढ़ते क्रेज के बावजूद, आज हमारी घरेलू पॉपकॉर्न इंडस्ट्री दो सबसे बड़ी मुश्किलों से जूझ रही है. पहली समस्या पड़ोसी देशों से होने वाली पॉपकॉर्न मक्के की अवैध तस्करी . दूसरी समस्या विदेशी माल की असली कीमत को छुपाकर, उसे कम दाम पर दिखाने की चालाकी है, जिसे 'अंडर-इनवॉइसिंग' कहा जाता है. इन दोनों वजहों से भारतीय बाजार में पॉपकॉर्न के दाम जबरदस्ती बहुत ज्यादा गिरा दिए जाते हैं. इसका सीधा और बुरा असर हमारे स्थानीय बाजार और भारतीय किसानों की जेब पर पड़ रहा है, जिससे उनकी मेहनत की कमाई प्रभावित हो रही है. साथ ही, इस अवैध खेल से सरकार को भी टैक्स का भारी नुकसान हो रहा है.इस गंभीर समस्या को रोकने के लिए कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को तुरंत सख्त कदम उठाने चाहिए और पॉपकॉर्न के आयात पर एक 'मिनिमम इम्पोर्ट प्राइस' (MIP) यानी न्यूनतम आयात मूल्य तय कर देना चाहिए ताकि हमारे देसी किसानों को सुरक्षा मिल सके.

देशी हाइब्रिड का किसानों का भरोसा

गौरमेट पॉपकॉर्निका कंपनी का असली ताकत हमारे देश के वो 17,500 से ज्यादा किसान हैं, जो आज 9 अलग-अलग राज्यों में कंपनी के साथ जुड़कर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे हैं. इस सफर में सबसे बड़ा मोड़ फरवरी 2021 के बाद आया, जब ICAR-IIMR द्वारा विकसित भारत के पहले स्वदेशी पॉपकॉर्न हाइब्रिड 'LPCH 3' को लेकर एक ऑफिशियल डील हुई। यह नया सरकारी बीज खेत में बंपर पैदावार देता है, इसकी पॉपिंग क्वालिटी  बहुत शानदार है, और इसमें बीमारियों तथा कीड़ों से लड़ने की ज़बरदस्त ताकत है. कंपनी की मजबूत टीम जमीन की पहचान करने से लेकर, सही बीज और खाद देने तक, हर कदम पर किसानों के साथ खड़ी रहती है. सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि कंपनी किसानों को खेती का सारा सामान क्रेडिट  पर देती है और फसल तैयार होने पर उसे पूरी तरह खुद खरीदने की 100% गारंटी लेती है, जिससे किसानों का जोखिम बिल्कुल खत्म हो जाता है.

खेतों से सिनेमा हॉल तक 

जब किसान खेतों से पॉपकॉर्न की मक्का काट लेते हैं, तो उस गीली फसल को तुरंतगौरमेट पॉपकॉर्निका  के आंध्र प्रदेश के मुसुनुरु में बने हाई-टेक प्रोसेसिंग प्लांट में भेजा जाता है. यह भारत का इकलौता ऐसा अत्याधुनिक प्लांट है जहाँ 90 परसेंट से ज्यादा काम इंसानों के बजाय पूरी तरह मशीनों से ऑटोमैटिक तरीके से होता है. यहाँ मक्के को वैज्ञानिक तरीके से सुखाया, छांटा और कोल्ड स्टोरेज में तब तक सुरक्षित रखा जाता है जब तक वह बिकने के लिए पूरी तरह तैयार न हो जाए। आज गौरमेट पॉपकॉर्निका का यह प्रीमियम देसी पॉपकॉर्न देश के 2,200 से ज्यादा बड़े सिनेमा हॉलों, नामी सुपरमार्केट्स और 100 से ज्यादा बड़े थोक व्यापारियों को सप्लाई किया जाता है. यही नहीं, कंपनी की अपनी एक स्पेशल इन-हाउस शेफ टीम है, जो ग्राहकों और सिनेमा चेन्स की पसंद को ध्यान में रखकर नए-नए स्वादिष्ट फ्लेवर्स और सीज़निंग मसाले तैयार करती है. यही वजह है कि आज भारत के खेतों से निकला यह पॉपकॉर्न स्वाद के मामले में विदेशी ब्रांड्स को पछाड़कर लोगों के दिलों पर राज कर रहा है.

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