खेतों में केमिकल खादों का इस्तेमाल बढ़ाभारतीय कृषि के इतिहास में 1960 का दशक एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था. जब देश में हाई-यील्डिंग वैरायटी यानी अधिक उपज देने वाले बीजों की एंट्री हुई, तो उनके साथ केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा. अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें, तो हरित क्रांति से पहले यानी 1965-66 में पूरे देश में रासायनिक खादों की कुल खपत महज 7.8 लाख टन थी. उस दौर में खेतों में फर्टिलाइजर प्रति हेक्टयर इस्तेमाल नाममात्र का था और प्रति हेक्टेयर औसतन 2-3 किलोग्राम से भी कम खाद डाली जाती थी. लेकिन पैदावार बढ़ाने की अंधी दौड़ में यह खपत साल दर साल छलांगें मारती रही.
साल 2024-25 में देश में कुल फर्टिलाइजर NPK की खपत बढ़कर लगभग 330 लाख मीट्रिक टन के डरावने स्तर पर पहुंच चुकी है. आज हमारे खेतों में खाद डालने की तीव्रता बढ़कर 151 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है, जो यह साफ बताती है कि हमने अपनी मिट्टी को रसायनों का आदी बना दिया है. यह खेती के घाटे का ऐसा दुष्चक्र है जिसने किसान की लागत बढ़ा दी, सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बोझ लादा और हमारी उपजाऊ जमीन को बंजर बना दिया.
सबसे बड़ी चिंता यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों की तमाम योजनाओं के तहत गांवों और ब्लॉकों में कृषि विभाग से जुड़े जमीनी स्टाफ की एक भारी फौज तैनात होने के बावजूद खेतों में केमिकल का अंधाधुंध इस्तेमाल जारी है.
अब जरा उस कड़वे गणित को समझते हैं जिसे अक्सर फाइलों में छुपा दिया जाता है. 1960 के दशक में देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 894 लाख टन था. साठ सालों की जी-तोड़ मेहनत और संसाधनों को झोंकने के बाद साल 2024-25 में हमारा कुल खाद्यान्न उत्पादन 3539.59 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचा है. यानी उत्पादन में तकरीबन 4 गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई. अब इसके समानांतर खाद की खपत को देखिए.
खाद कभी 7.8 लाख टन लगती थी, वह आज लगभग 330 लाख टन लग रही है, यानी इसमें सीधे-सीधे 40 गुना से भी ज्यादा का उछाल आया है. यह अनुपात चीख-चीख कर कह रहा है कि जिस रफ्तार से हमने खेतों में केमिकल झोंके, उस रफ्तार से हमारी फसलों ने पैदावार नहीं दी. सीधे शब्दों में कहें तो इनपुट लागत लगातार बढ़ती गई और मुनाफा व उत्पादन का रेशियो लगातार घटता गया.
आज स्थिति यह है कि मिट्टी की उर्वरता इस कदर खत्म हो चुकी है कि अब उतनी ही पैदावार लेने के लिए किसान को हर साल पहले से ज्यादा बोरी खाद खेत में डालनी पड़ती है. यह खेती के घाटे का वह दुष्चक्र है, जिसने देश पर विदेशी निर्भरता का बोझ बढ़ाया है और जमीन को बंजर बना दिया है.
आखिर हम इस मोड़ पर पहुंचे कैसे? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आजादी के बाद से हमारे सरकारी महकमों, और नीति निर्माताओं के बीच सिर्फ और सिर्फ 'उत्पादन बढ़ाने' पर चर्चा होती रही. रिकॉर्ड तोड़ पैदावार के आंकड़े दिखाकर पीठ तो थपथपाई गई, लेकिन इस बात पर कभी गंभीरता से ध्यान ही नहीं दिया गया कि इस उत्पादन को पाने में किसान की जेब से कितना पैसा निकल गया.
बात सिर्फ किसान की व्यक्तिगत लागत की ही नहीं है, बल्कि देश के खजाने की भी है. हर साल केमिकल फर्टिलाइजर पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी का हजारों-लाखों करोड़ रुपया, जो असल में देश के टैक्सपेयर्स का पैसा है, विदेशों से कच्चा माल और खाद आयात करने में चला जाता है. देश का पैसा विदेशों में बहता रहा और बदले में हमें क्या मिला?
हमारी अपनी मिट्टी का बेरहम दोहन. सॉयल हेल्थ कार्ड जैसी योजनाएं कागजों पर तो आईं, लेकिन जमीन पर किसान आज भी इसी मुगालते में है कि जितनी ज्यादा बोरी यूरिया डालेगा, उतनी ही अच्छी फसल होगी. संतुलित खाद उपयोग की सही जानकारी के अभाव में देश की अनमोल मिट्टी को जहर की भट्टी बना दिया गया.
ऐसा नहीं है कि सरकार के पास इसके लिए सिस्टम या पैसे की कमी है. भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के पास कई भारी-भरकम योजनाएं हैं. पहली है 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, जिसका मुख्य फोकस टिकाऊ खेती, कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर और सॉयल हेल्थ मैनेजमेंट पर है. दूसरी है 'कृषोन्नति योजना', जो खाद्य सुरक्षा और डिजिटल एग्रीकल्चर पर काम करती है. इसी के तहत एक सबसे महत्वपूर्ण घटक आता है—'आत्मा योजना' जो मुख्य रूप से किसानों की ट्रेनिंग और तकनीक विस्तार का कार्यक्रम है.
इन योजनाओं का सालाना संयुक्त बजट 16 से 17 हजार करोड़ रुपये से भी ऊपर बैठता है. ताकत की बात करें तो अकेले 'आत्मा' परियोजना के तहत देश के सभी जिलों के 6000 से अधिक ब्लॉकों में बकायदा कर्मचारी तैनात हैं. इसके अलावा राज्य सरकारों के अपने कृषि विभागों का अमला भी ब्लॉक स्तर पर मौजूद है. इतनी बड़ी फौज, अरबों का बजट और हर ब्लॉक में सरकारी नुमाइंदों की मौजूदगी के बाद भी अगर देश के किसान को यह नहीं पता कि उसके खेत को कितनी खाद चाहिए, तो यह सीधे तौर पर सिस्टम की नाकामी है. सरकारी मशीनरी सिर्फ कागजी आंकड़ों और ट्रेनिंग के नाम पर खानापूर्ति करने में व्यस्त रही, जबकि खेतों में यूरिया का ओवरडोज जारी रहा.
केंद्र सरकार 'खेत बचाओ अभियान' की तरह संतुलित खाद उपयोग के लिए बड़े-बड़े 'नेशनल इनपुट कॉन्क्लेव' चलाती है. लेकिन, ये तब तक फेल होते रहेंगे जब तक ग्राउंड यानी गांव और ब्लॉक पर जिम्मेदारी तय नहीं होगी. अब वक्त है कि लोकल स्तर पर नई जिम्मेदारी सौंपी जाए. इसके लिए राज्य के कृषि विभाग, 'आत्मा' की टीम और सहकारी समितियों को सीधे 'ब्लॉक-वाइज' जवाबदेह बनाया जाए.
केंद्र सिर्फ फंड और गाइडलाइंस जारी करके पल्ला न झाड़े, बल्कि जमीन पर सख्त मॉनिटरिंग करे. विशेषकर जिन राज्यों या जिलों में फर्टिलाइजर का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है—और जहां भाजपा शासित या केंद्र से बेहतर तालमेल वाली सरकारें हैं—इस मुहिम को सफल बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को आपस में मजबूत पॉलिटिकल और एडमिनिस्ट्रेटिव तालमेल बिठाना होगा.
विशेष रूप से, ज्यादा खाद की खपत वाले इन इलाकों में ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय होनी चाहिए. अगर उनके एरिया में बिना जरूरत या बिना मिट्टी जांच के खाद की बेतहाशा बिक्री या इस्तेमाल हुआ, तो सीधे उन अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाए. जब तक जमीनी स्तर पर यह कड़ा एक्शन नहीं लिया जाएगा, तब तक न तो हमारी मिट्टी बचेगी और न ही किसान का पैसा.
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