स्मार्ट सिंचाई से पानी की बचत के साथ पैदावार मिलेगी बंपरआज के दौर में लगातार गिरता वाटर लेवल, कम होती बारिश और मौसम का बदलता मिजाज हमारी खेती के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुके हैं. दुनिया भर में भले ही सिर्फ 20 फीसदी जमीन पर सिंचित खेती होती है, लेकिन यही हिस्सा दुनिया की 40 फीसदी आबादी का पेट भरता है. अगर भारत की बात करें, तो हमारे पास दुनिया का सिर्फ 4 फीसदी पानी है, जबकि यहां दुनिया की 16 फीसदी आबादी रहती है. सबसे अहम बात यह है कि हमारे देश में कुल पानी का 83 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ और सिर्फ खेती-किसानी में इस्तेमाल होता है. ऐसे में अगर हमने पानी का सही इंतजाम नहीं किया, तो आने वाले वक्त में फसलों को बचाना बेहद मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि सही मैनेजमेंट का मतलब सिर्फ पानी बचाना नहीं है, बल्कि कम से कम पानी में भरपूर पैदावार लेना और जमीन की सेहत को महफूज रखना है.
विशेषज्ञों के अनुसार धान एक ऐसी फसल है जिसे सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है, लेकिन पूरे खेत को हमेशा पानी से लबालब भरने के बजाय, अगर अक्लमंदी से सिंचाई की जाए तो काफी पानी बचाया जा सकता है. इसकी शुरुआत नर्सरी से ही हो जाती है जहां मिट्टी में नमी तो होनी चाहिए, लेकिन पानी जमा नहीं होना चाहिए और इस नाजुक वक्त में स्प्रिंकलर सबसे बेस्ट है. पानी को बेवजह बहने से रोकने के लिए हमेशा शाम के वक्त सिंचाई करें और रोपाई के करीब एक हफ्ते बाद जब पौधे जड़ पकड़ने लगें और कल्ले निकलने लगें, तब खेत में सिर्फ 2 से 3 सेंटीमीटर पानी रखें, क्योंकि शुरुआती दिनों में ज्यादा पानी भरने से पौधे पीले पड़कर सूख जाते हैं.
इसके बाद जब धान में बालियां बनने लगें, फूल निकल रहे हों और दानों का विकास हो रहा हो, उस वक्त खेत में 5 से 7 सेंटीमीटर पानी होना बेहद जरूरी है, लेकिन इन खास दिनों के अलावा खेत में फालतू पानी जमा न होने दें क्योंकि बीच के दिनों में ज्यादा पानी भरा रहने से पौधों की बढ़त रुक जाती है और बालियां आने के बाद फसल के गिरने व सड़ने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए जिन निचले खेतों में हमेशा पानी भरा रहता है, वहां जल निकासी का फौरन बंदोबस्त करें.
गन्ने की फसल को मिट्टी और मौसम के हिसाब से पानी की जरूरत होती है और अगर खेत को सही नमी न मिले, तो गन्ने की लंबाई और उसके रस की क्वालिटी दोनों खराब हो जाती हैं, इसलिए सूखे के इस दौर में नई टेक्नोलॉजी अपनाना बहुत जरूरी है. कृषि विशषज्ञों के अनुसार गन्ने में ड्रिप विधि से सिंचाई करने पर पारंपरिक तरीकों के मुकाबले सीधे 60 प्रतिशत पानी की बचत होती है. इसके अलावा जब फसल 5-6 महीने की हो जाए, तो फव्वारा विधि से सिंचाई करके भी 40 प्रतिशत तक पानी बचाया जा सकता है.
पानी का उड़ना रोकने के लिए गन्ने की सूखी पत्तियों की 10-15 सेंटीमीटर मोटी परत कूंड़ों में बिछानी चाहिए ताकि मिट्टी की नमी लंबे समय तक बरकरार रहे. गर्मियों में पानी की भारी किल्लत होने पर एक कूंड़ छोड़कर सिंचाई करनी चाहिए और भारी मिट्टी वाले खेतों में गर्मियों के दिनों में 8-10 दिन और हल्की मिट्टी में 5-7 दिन के फासले पर 7 से 8 सेंटीमीटर गहरी सिंचाई करना सबसे ज्यादा फायदेमंद रहता है.
मक्का एक ऐसी संवेदनशील फसल है जो न तो सूखा बर्दाश्त कर सकती है और न ही ज्यादा पानी का जमा होना. इसलिए बुआई के वक्त ही खेत में पानी निकलने के लिए सही नालियां बना लेनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर पानी दिया जा सके और फालतू पानी को आसानी से बाहर निकाला जा सके, जिसमें दो-तिहाई ऊंचाई तक ही पानी भरना सबसे बेहतर रहता है. मक्के में नई पौध बनते समय, घुटनों तक की ऊंचाई होने पर, फूल आने और भुट्टे में दाने भरने का वक्त सबसे नाजुक होता है क्योंकि इस दौरान पानी की कमी से पैदावार घट जाती है. इसलिए जिन इलाकों में पानी भरता है, वहां मक्के को मेड़ों पर उगाना चाहिए और ड्रिप सिंचाई अपनाकर पानी की बचत और पैदावार दोनों बढ़ाई जा सकती है.
दूसरी तरफ, दलहन (दालें) और तिलहन की फसलें ज्यादातर बारिश के भरोसे होती हैं और कम बारिश की सूरत में, जब पौधों में शाखाएं बन रही हों और दाने बढ़ रहे हों, तब पानी की कमी इनका भारी नुकसान करती है. इसलिए इन नाजुक अवस्थाओं में सिंचाई करना बेहद जरूरी है और इन फसलों को चौड़ी मेड़ों पर बोना सबसे फायदेमंद होता है, जिससे सूखे मौसम में भी पौधों को पूरी नमी मिलती है और एक्स्ट्रा पानी भी आसानी से निकल जाता है.
पारंपरिक तरीकों में पानी सीधे खेत में छोड़ दिया जाता है, जिससे वह ढलान की तरफ बहकर बर्बाद हो जाता है, इसलिए इस बर्बादी को रोकने के लिए सबसे पहले जमीन को लेवल करके हल्का सा ढाल देना जरूरी है ताकि फसल को पानी असमान रूप से न मिले. आज के जल संकट से निपटने का सबसे अचूक इलाज सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली यानी ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक विधियां हैं क्योंकि ये तकनीकें खेत के हर एक पौधे को एक समान पानी देती हैं, जिससे 85 से 95 प्रतिशत तक पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है.
इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने से जल की कमी वाले क्षेत्रों को बड़ा लाभ होता है, क्योंकि इनसे न केवल पानी की जरूरत कई गुना कम हो जाती है बल्कि सिंचाई के लिए लेबर का खर्च भी घट जाता है. साथ ही इस सिस्टम के जरिए खाद और दवाइयां सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाई जा सकती हैं जिससे उनकी बर्बादी रुकती है, खेती की लागत कम होती है और फसल की क्वालिटी व पैदावार में लाजवाब सुधार होता है.
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