शाकाहार बनाम मांसाहार पर लंबे समय से बहसें चली आ रही हैं. सवाल स्वाद का भी है और शरीर को मिलने वाले प्रोटीन का भी. मांसाहार को शरीर में ऊर्जा के मुख्य स्रोत प्रोटीन का आधार माना जाता है, लेकिन सवाल यह भी कि आखिर शाकाहारी लोग कैसे अपनी प्रोटीन की खुराक पूरी करते होंगे? ये चिंता तब और बढ़ जाती है जब देश में शाकाहारी लोगों के प्रोटीन का मुख्य आधार माने जाने वाली दालों की घनघोर कमी दिखाई दे रही हो और जिसे पूरा करने के लिए सरकार दालों का इंपोर्ट करने काे मजबूर हो. लेकिन इसके उलट आजादी के बाद की तुलना में देश में प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता बढ़ने के बजाय कम हो गई है. यानी शाकाहारी लोगों के सामने प्रोटीन का संंकट गहराया हुआ है. आंकड़ों से समझें तो देश में साल 1950 में सालाना प्रति व्यक्ति 22.1 किलो दालों की उपलब्धता थी, जो अब घटकर 19.6 किलो रह गई है. वहीं साल 2014 में तो यह महज 16.9 किलो ही थी.
बहरहाल, दुनिया में दालों के सबसे बड़े उत्पादक भारत को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन देशों से दालों का इंपोर्ट करना पड़ रहा है, जो दलहन उत्पादन के मामले में हमारे सामने कहीं नहीं ठहरते. एक तरफ राजनेता दलहन के मामले में आत्मनिर्भर भारत का नारा लगाते रहे हैं तो दूसरी ओर इंपोर्ट बढ़ रहा है. नतीजा यह है सरकारी रिकॉर्ड में 1 जुलाई 2024 को अरहर दाल का अधिकतम थोक दाम 207, उड़द का 190, मूंग का 170 और मसूर दाल का अधिकतम दाम 174 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है.
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केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2018-19 में भारत ने सिर्फ 8,035 करोड़ रुपये की दालों को आयात किया था, जो 2023-24 में बढ़कर 31,072 करोड़ रुपये हो गया है. वित्तीय वर्ष 2024-25 के पहले महीने यानी अप्रैल में तो रिकॉर्ड 3429 करोड़ रुपये की दालों का आयात हुआ है, जो बता रहा है कि आयात पर हमारी निर्भरता और बढ़ने वाली है, क्योंकि यह पिछले साल के अप्रैल की तुलना में करीब तीन गुना अधिक है.
बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए दलहन फसलों की खेती का जितना विस्तार होना चाहिए उतना नहीं हुआ. देश में किसानों ने गेहूं-धान की फसलों को तवज्जो दी, जो उस वक्त की जरूरत थी. लेकिन नीति निर्माताओं ने समय-समय पर अलग-अलग फसलों के उत्पादन को लेकर मंथन नहीं किया, ऐसे में दलहन फसलें पीछे छूटती गईं. नतीजतन, किसानों के बीच गेहूं और धान के मुकाबले दलहन फसलों की हैसियत कम होती गई. क्योंकि गेहूं, धान की एमएसपी पर खरीद सुनिश्चित हो गई थी, जबकि दलहन के मामले में ऐसा नहीं हुआ.
हमारे नीति निर्धारकों की नींद तब खुली जब बहुत देर हो चुकी थी. दलहन में आत्मनिर्भर बनने के लिए हमारे नेताओं और नीति निर्धारकों ने नारा तो खूब लगाया, लेकिन ग्राउंड पर पर काम नहीं किया, नतीजा यह है कि दलहन फसलों की खेती बढ़ने की बजाय घट गई. यही कड़वी सच्चाई है. आंकड़ें इसकी तस्दीक कर रहे हैं. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार 2020-21 में देश में 287.83 लाख हेक्टेयर में दलहन फसलों की बुवाई हुई थी, बुवाई का ये रकबा 2023-24 में घटकर सिर्फ 270.14 लाख हेक्टेयर रह गया है. जाहिर है कि सरकार दलहन फसलों का एरिया बढ़वाने में सरकार नाकाम रही है.
जब देश में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी उससे पहले पंजाब में दलहन फसलों का उत्पादन अच्छा खासा था. लेकिन, जब से एमएसपी पर गेहूं-धान की ज्यादा खरीद होने लगी तब से इसका रकबा घटता चला गया. पंजाब कृषि विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1960-61 में राज्य के 19.1 फीसदी क्षेत्र में दलहन फसलों की खेती होती थी, जो 2020-21 में घटकर सिर्फ 0.4 फीसदी रह गई. यही हाल, कई और राज्यों में भी हुआ है. वजह यह है कि धान, गेहूं के मुकाबले दलहन फसलों की सरकारी खरीद को तवज्जो नहीं दी गई.
आजादी के बाद भारत में दलहन फसलों की बुवाई का रकबा गेहूं की तुलना में लगभग डबल था. वर्ष 1950-51 में भारत में गेहूं का एरिया 97.5 लाख हेक्टेयर था, जो 2023-24 में बढ़कर 312.34 लाख हेक्टेयर हो गया. दूसरी ओर, वर्ष 1950-51 में देश में 190.9 लाख हेक्टेयर में दलहन फसलों की खेती हुई थी, जबकि 2023-2024 में इसका एरिया बढ़कर सिर्फ 270 लाख हेक्टेयर ही हो पाया. इससे दालों की मांग और आपूर्ति में काफी अंतर आ गया.
यह सच है कि गेहूं, धान के मुकाबले दलहन फसलों की खरीद नहीं हुई. लेकिन, यहां वैज्ञानिकों की भूमिका पर भी सवाल उठाना जरूरी है. देश के वैज्ञानिक अधिक उत्पादन देने वाली किस्में बनाने में फेल रहे हैं. इसलिए उत्पादकता में देश पीछे रहा हैं. वरना जितने क्षेत्र में दलहन फसलों की खेती भारत में होती है, उतने में न सिर्फ देश दालों के मामले आत्मनिर्भर बल्कि निर्यातक भी बन जाता.
दलहन फसलों की कनाडा और चीन जैसी उत्पादकता होती तो फिर आज हम दालों के कम से कम इंपोर्टर तो नहीं होते. कृषि मंत्रालय के मुताबिक 2023-24 में देश में प्रति हेक्टयर दालों का उपज 907 किलो रही, जबकि, संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में दलहल फसलों की सबसे ज्यादा उत्पादकता कनाडा में है, जहां 2018 में ही प्रति हेक्टेयर 1950 किलो दाल पैदा होती थी.
एफएओ के मुताबिक साल 2022 में विश्व के कुल दलहन का 27.8 फीसदी उत्पादन भारत में हुआ. दूसरे नंबर पर कनाडा है, जिसकी विश्व के कुल उत्पादन में सिर्फ 6.7 फीसदी हिस्सेदारी है. इसी तरह 5.2 फीसदी के साथ चीन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है. इसके बाद नाइजीरिया, रूस, म्यांमार, आस्ट्रेलिया, इथोपिया, ब्राजील, अमेरिका और तंजानिया का नंबर आता है.
भारत में दलहन फसलें खरीफ, रबी और जायद तीनों सीजन में उगाई जाती हैं. रबी सीजन में सबसे ज्यादा 150 लाख हेक्टेयर, खरीफ में 140 लाख और जायद में 20 लाख हेक्टेयर में दलहन फसलों की बुवाई होती है. इसमें से करीब 100 लाख हेक्टेयर का एरिया सिर्फ चने का है. यानी दलहन फसलों में चने की हिस्सेदारी ज्यादा है. जबकि अरहर की बुवाई 47 लाख हेक्टेयर में होती है. अरहर, मूंग, सोयाबीन, उड़द और लोबिया आदि खरीफ सीजन की फसल हैं. इसी तरह चना, मटर, मसूर और मूंग आदि रबी सीजन की फसलें हैं. जबकि मूंग और उड़द जायद सीजन में उगाया जाता है.
केंद्र सरकार ने कहा है कि अगर दलहन उत्पादक किसान नेफेड में रजिस्ट्रेशन करवाते हैं तो उनकी दलहन की सौ फीसदी उपज को खरीदा जाएगा. यानी इसका एरिया और उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने दलहन खरीद की गारंटी दे दी है. हालाकि ओपन मार्केट में इसका दाम एमएसपी से अधिक चल रहा है. ऐसे में किसान, सरकार को अपनी उपज बेचेंगे इसकी संभावना कम है.
बहरहाल, दालों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने अरहर, उड़द और मसूर दाल पर लगी 40 प्रतिशत की खरीद सीमा को हटा लिया है. पहले कुल उत्पादन का सिर्फ 40 परसेंट ही एसमएसपी पर खरीदा जाता था. अब 100 फीसदी खरीद होगी. हालांकि, जब तक किसानों को अन्य फसलों के मुकाबले इसकी खेती में फायदा नहीं दिखाई देगा तब तक इसकी खेती का विस्तार नहीं हो सकता.
उधर, केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने दावा किया है कि किसानों के सहयोग से भारत दिसंबर 2027 से पहले दलहन उत्पादन के क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर' हो जाएगा और देश को एक किलोग्राम दाल भी आयात नहीं करनी पड़ेगी. देखना यह है कि क्या यह दावा सच हो पाएगा या अभी भी दलहन के मामले में भारत 'आयात निर्भर' देश बना रहेगा.
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