Fisheries Technology: टेक्नोलॉजी की मदद से तालाब से घर तक फ्रेश मछली पहुंचाने की है तैयारी

Fisheries Technology: टेक्नोलॉजी की मदद से तालाब से घर तक फ्रेश मछली पहुंचाने की है तैयारी

Fisheries Technology मछलियों के बड़े-बड़े तालाब पर अब जाल से ज्यादा ड्रोन, रडार, कैमरा और सेंसर की बात होती है. तालाब के किनारे घूमकर निगरानी करने के बजाए एसी ऑफिस या घर में बैठकर लैपटॉप पर तालाब की एक-एक मछली पर नजर रखी जाती है. जिससे प्रोडक्शन बढ़ने के साथ दाम भी अच्छे मिल रहे हैं. और ये सब मुमकिन हो रहा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से. 

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Fisheries Technology: टेक्नोलॉजी की मदद से तालाब से घर तक फ्रेश मछली पहुंचाने की है तैयारी

मछली खाने का हर किसी का अपना एक तरीका होता है. लेकिन, अगर महीने के 30 दिन मछली खाने वाले की बात करें या हफ्ते में एक दिन मछली खाने वालों की, ख्वाहिश सभी की एक ही होती है कि जो भी मछली खाने को मिले वो फ्रेश हो. फिशरीज एक्सपर्ट की मानें तो मछली के दाम भी उसकी फ्रेशनेश से होते हैं. यही वजह है कि हर एक मछली पालक की कोशि‍श होती है कि मछली उसके तालाब से निकलकर बाजार तक फ्रेश ही पहुंचे. इसी को ध्यान में रखते हुए फिशरीज एक्सपर्ट मौजूदा हाईटेक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं. 

मछलियों को न सिर्फ बाजार तक, बल्कि तालाब से लेकर घर तक फ्रेश भेजने की कोशि‍श हो रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर फ्रेश फिश घरों तक पहुंचाई जा रही है. फिश सीड से लेकर दो किलो तक की मछली तैयार करने में पूरी तरह से एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है. एआई के चलते बीमार मछली बाजार तक आने का खतरा भी कम हो गया है. क्योंकि नदी-तालाब से बाजार तक फ्रेश मछली लेकर आना बड़ा नामुमकिन सा हो गया है. 

ड्रोन बताता है तालाब का तापमान

मछलियों की अच्छी सेहत के लिए जरूरी है कि तालाब का पानी सामान्य रहना चाहिए. मतलब जिस मछली की जैसी जरूरत है उसके मुताबिक. गर्मी हो या सर्दी मछलियों को ना तो बहुत ज्यादा ठंडा और ना ही ज्यादा गर्म पानी चाहिए होता है. इसलिए हर मौसम में मछली पालक तालाब के पानी को सामान्य बनाए रखने के लिए कई तरह के उपाय अपनाते हैं. कई बार तो थर्मामीटर लगाकर पानी का तापमान जांचना पड़ता है. लेकिन ड्रोन में लगा सेंसर पानी के तापमान की रिपोर्ट आपके मोबाइल या फिर लैपटॉप पर भेज देता है. पानी प्रदूषित है तो किस तरह से ये रिपोर्ट भी ड्रोन में लगे सेंसर बता देते हैं. 

बीमार मछलियों के फोटो देना है ड्रोन

तालाब पर उड़ने के दौरान ड्रोन में लगे कैमरे उसकी तस्वीर भेजते रहते हैं. तालाब पर बहुत नीचे ड्रोन उड़ाने से उसमे मौजूद मछलियां भी साफ-साफ दिखाई देने लगती हैं. इससे मछलियों की प्रमुख बीमारी लाल धब्बा भी दिखाई देने लगती है. या फिर मछलियां तालाब में कैसा व्यवहार कर रही हैं ये भी पता चल जाता है. फिशरीज एक्सपर्ट बताते हैं कि तालाब में दवाई का छिड़काव भी ड्रोन से किया जा रहा है. तालाब में दवाई का छिड़काव करते वक्त यह ख्याल रखना पड़ता है कि सभी मछलियां दवाई के प्रभाव में आ जाएं. लेकिन हाथ से दवाई का छिड़काव कैसे भी कर लो तालाब में कुछ न कुछ मछलियां छूट ही जाती हैं. 

कुछ बीमारी ऐसी होती हैं कि अगर सभी मछली ठीक हो जाएं और एक भी बीमार रह गई तो वो फिर से पूरे तालाब की मछलियों को बीमार कर देगी. जबकि ड्रोन से खेत की तरह दवाई भी पूरे हिस्से में छिड़क दी जाती है और तालाब की हर एक मछली उसके प्रभाव में आ जाती है. मछली तालाब के बीच में है. आपको किनारे से दिखाई नहीं दे रही है तो ऐसे में ड्रोन उसे आपके मोबाइल और लैपटॉप पर दिखा देता है.

हर एक मछली तक फीड पहुंचाता है ड्रोन 

एक्सपर्ट की मानें तो हम कभी तालाब के एक कोने पर तो कभी दूसरे और तीसरे कोने पर जाकर मछलियों को हाथ से दाना खिलाते हैं. कोशिश यही होती है कि सभी मछलियों को बराबर दाना मिल जाए. ऐसा ना हो कि कोई मछली मोटी ताजी हो जाए तो कोई कमजोर रह जाए. ऐसा इसलिए करना होता है कि तालाब की जो ताकतवर मछली हैं वो दाना खाने के लिए एकदम आगे यानि तालाब के किनारे पर आ जाती हैं, जबकि कमजोर मछली पीछे रह जाती है. 
उसे भरपेट दाना नहीं मिल पाता है. जिसके चलते दूसरी मछलियों के मुकाबले वो कम वजन की रह जाती हैं. इससे मछली पालक को भी बड़ा नुकसान होता है. लेकिन ड्रोन से जब दाना तालाब में डाला जाता है तो वो बराबर रूप से पूरे तालाब में दाना डालता है. जिसके चलते तालाब के सभी हिस्से में मौजूद मछलियों को दाना खाने का मौका मिल जाता है.

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