14 मई को आगरा में होगा दुग्ध समागम‘दूध के दाम बढ़ते ही हो-हल्ला शुरू हो जाता है. लोग इसे महंगाई से जोड़कर देखने लगते हैं. लेकिन इसकी तह में जाने की कोशिश नहीं करता है कि दूध के दाम आखिर क्यों बढ़ाने की जरूरत पड़ी. जब पशुपालक को दो पैसे का मुनाफा नहीं होगा तो वो क्यों गाय-भैंस और भेड़-बकरियों को पालेगा.’ ये कहना है अमूल के पूर्व एमडी और इंडियन डेयरी एसोसिएशन के पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी का. उनका कहना है कि दूध उत्पादन की लागत बढ़ गई है. चारा हरा हो या सूखा डेयरी फार्मर उसकी कमी और महंगाई से जूझ रहे हैं. दाना और मिनरल मिक्चर भी बहुत महंगा हो गया है.
पशुओं की बीमारियों ने भी दूध की लागत को बढ़ा दिया है. परेशानी ये है कि लागत के मुकाबले डेयरी फार्मर को दूध का सही दाम नहीं मिल पा रहा है. अगर अब भी दूध की सही कीमत किसान को नहीं दी गई तो वो पशुपालन को छोड़ सकता है. उसकी नई पीढ़ी ने पहले ही पशुपालन कम कर दिया है. अगर दूध की किल्लत हुई तो अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोप और न्यूजीलैंड जैसे देश पहले ही अपने डेयरी प्रोडक्ट भारत में खपाने के लिए तैयार खड़े हैं.
डॉ. सोढ़ी ने किसान तक से बातचीत में बताया कि उदाहरण के तौर पर बाजार में टोंड मिल्क 60 रुपये लीटर बिक रहा है. जबकि पशुपालक से यही दूध 40 रुपये लीटर खरीदा जा रहा है. मतलब खरीद और बिक्री के बीच में 20 रुपये लीटर का अंतर है. अब अगर हमे पशुपालक को दूध के सही दाम देने हैं तो खरीद और बिक्री के बीच ये अंतर 15 रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए. घरेलू बाजार और इंटरनेशनल इश्यूज को देखते हुए ये बहुत जरूरी हो गया है कि पशुपालक के हाथ में उसके दूध की लागत के साथ-साथ दूध का अच्छा मुनाफा भी पहुंचे.
डॉ. सोढ़ी ने बताया कि अगर हम बीते कुछ साल के दूध उत्पादन के आंकड़े देखें तो हालात ठीक नहीं हैं. पहले दूध उत्पादन 5 से 5.5 फीसद की दर से हर साल बढ़ रहा था. लेकिन अब ये दर 3.5 फीसद पर आ गई है. सभी तरह के चारे महंगे हो रहे हैं. आने वाला वक्त भी खतरे की घंटी है. अलनीनो का खतरा लगातार बना हुआ है. ईरान-अमेरिका वॉर के चलते फर्टिलाइजर का संकट भी बड़ा खतरा हो सकता है.
ये भी पढ़ें- केंद्र के आंकड़ों में 'जीरो' है मध्य प्रदेश की गेहूं खरीद, पढ़ें बाकी राज्यों का हाल
ये भी पढ़ें- पशुपालकों और पर्यावरण तक के लिए ऐसे फायदेमंद है वाइट रेवोलुशन-2
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today