
मध्य प्रदेश अब देश में जैविक खेती का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है. राज्य में देश की कुल जैविक खेती में 27 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है. वहीं राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 1,513 क्लस्टरों में 1.89 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है. प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार देशी गोपालन करने वाले किसानों को ₹900 प्रतिमाह अनुदान भी दे रही है.
खरगौन के प्रगतिशील किसान अनिल वर्मा ने बताया कि सफेद मूसली की खेती ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल दी. इसी खेती से हुई कमाई के दम पर उन्होंने अपने बेटे प्रीतेश वर्मा को अमेरिका के ओहियो विश्वविद्यालय में कंप्यूटर साइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में मास्टर्स की पढ़ाई के लिए भेजा.पढ़ाई के दौरान ही उन्हें विश्वविद्यालय में पढ़ाने का अवसर भी मिल गया.
अनिल वर्मा बताते हैं कि सफेद मूसली के साथ वे पपीता, प्याज और सोयाबीन की खेती भी करते हैं. उनके खेत में दो कुएं और एक ट्यूबवेल है। अच्छी गुणवत्ता वाली सफेद मूसली की बाजार में हमेशा मांग बनी रहती है.
उन्होंने बताया कि खरगौन क्षेत्र में करीब 1,500 एकड़ में सफेद मूसली की खेती हो रही है, जिससे लगभग 1,000 किसान जुड़े हैं. इस फसल से किसान एक वर्ष में 5 से 7 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं.
अनिल वर्मा ने बताया कि पहले मूसली के छिलके हाथ से निकालने पड़ते थे, जिससे मजदूरी की लागत काफी बढ़ जाती थी. बाद में केंद्र सरकार से 35 प्रतिशत सब्सिडी पर छिलका निकालने की मशीन मिली. अब क्षेत्र के 50 से 60 किसान इस मशीन का उपयोग कर रहे हैं, जिससे समय और लागत दोनों में कमी आई है.
जैविक खेती के सफल किसान अविनाश दांगी ने भी अपने अनुभव साझा किए.उन्होंने बताया कि वे पिछले कई वर्षों से 54 एकड़ भूमि पर पूरी तरह जैविक खेती कर रहे हैं.उनके खेत पर करीब 40 गौवंश हैं और परिवार के आठ सदस्य खेती के कार्य में जुटे हैं.
वे हल्दी, धनिया और मिर्च जैसी मसाला फसलों का उत्पादन करते हैं और उनके जैविक उत्पाद देश के 13 राज्यों में भेजे जाते हैं.
अविनाश दांगी का कहना है कि सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन रासायनिक उर्वरकों पर मिलने वाली सब्सिडी का लाभ जैविक खेती करने वाले किसानों को नहीं मिल पाता. उनका सुझाव है कि जो किसान रासायनिक खाद का उपयोग नहीं करते, उन्हें भी उसी राशि के बराबर प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए.