
कृषि के क्षेत्र में फसलों की सिंचाई को लेकर ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई एक नई क्रांति लेकर आई है. इस तकनीक से पारंपरिक सिंचाई की तुलना में 60 प्रतिशत कम पानी की खपत होती है. साथ ही फसलों की सिंचाई कम समय में और आसानी से हो जाती है. वहीं, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई की सुविधा देश सहित बिहार के किसान ले सकें, इसको लेकर केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म) के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर 90% का अनुदान दिया जा रहा है. बिहार के किसान केंद्र द्वारा चलाई जा रही योजना का लाभ लेना चाहते हैं तो वे बिहार कृषि ऐप या विभाग की वेबसाइट के जरिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं.
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म) के तहत किसानों को सिंचाई से जुड़ी दो तरह की सुविधाएं शामिल हैं, जिसमें पहली सूक्ष्म सिंचाई पद्धति यानी टपकन या ड्रिप सिंचाई, मिनी या माइक्रो स्प्रिंकलर और पोर्टेबल स्प्रिंकलर से सिंचाई की योजना है. वहीं, दूसरा अन्य हस्तक्षेप है, जिसमें निजी नलकूप, कुआं और तालाब जैसे जल स्रोतों का विकास किया जाता है.
इस योजना के तहत ड्रिप सिंचाई पद्धति के अंतर्गत अनुदान की सीमा न्यूनतम 0.5 एकड़ और अधिकतम 12.5 एकड़ और पोर्टेबल स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति के अंतर्गत न्यूनतम 1 एकड़ और अधिकतम 5 एकड़ तक के लिए अनुदान का प्रावधान है. वहीं, इस योजना का पूर्व में लाभ ले चुके किसानों को 7 वर्षों के बाद ही दोबारा लाभ मिलेगा. छोटे किसान समूह में भी योजना का लाभ ले सकते हैं.
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म) के तहत राज्य के किसानों को विभिन्न श्रेणियों के अनुसार अनुदान देने का प्रावधान सरकार द्वारा तय किया गया है, जिसमें ड्रिप सिंचाई पद्धति के तहत लघु और सीमांत किसानों को संभावित लागत का 80% तक अनुदान दिया जाएगा. वहीं, अन्य किसानों को 70 प्रतिशत और एफआरए पट्टाधारक किसानों को 90 प्रतिशत सहायता अनुदान दिया जा रहा है. पोर्टेबल स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति के अंतर्गत लघु और सीमांत किसानों को संभावित लागत का 55 प्रतिशत और अन्य कृषकों को 45 प्रतिशत सहायता अनुदान सरकार की ओर से दिया जा रहा है.
ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई और रेनगन सिंचाई से फसलों की सिंचाई करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें पारंपरिक सिंचाई की तुलना में 60% तक कम पानी लगता है. इसके साथ ही इस प्रणाली के तहत किसान 25 से 30% उर्वरक की भी बचत कर सकते हैं. साथ ही उत्पादन में करीब 40 से 50% की वृद्धि भी होती है.
इस प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसमें पानी बूंद-बूंद के जरिए हर पौधे की जड़ों तक पहुंचता है. जबकि परंपरागत सिंचाई में खेतों में पानी कहीं ज्यादा तो कहीं कम लगने से फसलों को नुकसान भी पहुंचता है. लेकिन इसमें कुछ ही घंटों में कई एकड़ की फसल आसानी से सिंचित हो जाती है, जबकि परंपरागत सिंचाई में एक एकड़ की भी फसल को सिंचित करने के लिए पूरा दिन लग जाता है.