मसाला फसलों में धनिया भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इसकी खुशबू और स्वाद के कारण इसे सब्जी में मसालों के साथ प्रयोग में लाया जाता है. यही नहीं ताजा धनिये की पत्तियां हर सब्जी में पकने बाद डाली जाती है,जो सब्जी के स्वाद को और बढ़ा देती हैं. धनिये कि मांग बाज़ार में साल भर बनी रहती है ऐसे में किसानों के लिए धनिये की खेती फायदे का सौदा साबित हो सकती है. किसान इसकी खेती कर अच्छी कमाई कर सकते हैं. धनिया की अधिक पैदावार लेने के लिए किसानों को उसको सही समय पर खेती और अच्छी किस्मों का चयन करना बेहद जरूरी है, इसकी कुछ ऐसी किस्में हैं, जिसमें न कीट लगते हैं और न ही रोग होता है. इन किस्मों की खेती से किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. धनिया से दो तरीके से लाभ कमाया जा सकता है. धनिया को हरी अवस्था में इसके पत्तों को बेचकर और सूखी अवस्था में इसके दोनों को भी बेचकर किसान बढ़िया कमाई कर सकते हैं. जानिए धनिया की ऐसी ही 5 उन्नत किस्मों के बारे में.
सिम्पो एस 33 -
इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं. दाने बड़े एवं अंडाकार होते हैं. इस किस्म के पौधे उकठा रोग, स्टेमगाल रोग एवं भभूतिया रोग के प्रति सहनशील है. फसल को पक कर तैयार होने में 140 से 150 दिन का समय लगता है। प्रति एकड़ भूमि में खेती करने पर 7.2 से 8 क्विंटल तक पैदावार होती है.
स्वाति किस्म -
धनिया की इस किस्म को एपीएयू, गुंटूर द्वारा विकसित किया गया है. इस किस्म के फल पककर तैयार होने में 80-90 दिन का समय लेते हैं. इस किस्म से 885 किग्रा प्रति हेक्टेयर उपज मिल सकती है.
राजेंद्र स्वाति किस्म-
धनिया की ये किस्म 110 दिन में पककर तैयार हो जाती है. धनिया की ये किस्म आरएयू द्वारा विकसित की गई है. इससे 1200-1400 किग्रा प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है.
गुजरात कोरिनेडर-1-
इस किस्म के बीज मोटे और हरे रंग के होते हैं. इसके पकने की अवधि 112 दिन की होती है और इससे 1100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिल सकता है.
आर सी आर 446 -
असिंचित क्षेत्रों में खेती के लिए यह उपयुक्त किसमें है. इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं एवं शाखाएं सीधी होती हैं. दानों का आकार भी मध्यम होता है.इस किस्म के पौधों में पत्तियां अधिक आती हैं.हरी पत्तियां प्राप्त करने के लिए इस किस्म की खेती प्रमुखता से की जाती है. इस किस्म के पौधों में उकठा रोग, स्टेमगाल रोग एवं भभूतिया रोग का प्रकोप कम होता है. फसल को पक कर तैयार होने में 110 से 130 दिनों का समय लगता है. प्रति एकड़ खेत में खेती करने पर 4.1 से 5.2 क्विंटल तक पैदावार होती है.