उत्पादन बढ़ा, लेकिन मिट्टी हुई कमजोर... FAI महानिदेशक ने संतुलित खाद पर दिया जोर

उत्पादन बढ़ा, लेकिन मिट्टी हुई कमजोर... FAI महानिदेशक ने संतुलित खाद पर दिया जोर

भारत में मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन खेती के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, संतुलित उर्वरक उपयोग, नई तकनीकों और 4R रणनीति अपनाकर पोषक तत्व उपयोग दक्षता (NUE) बढ़ाना जरूरी है, तभी मिट्टी की सेहत सुधरेगी और लंबे दिनों तक कृषि टिकाऊ बन सकेगी.

अब नहीं होगी खाद की कमीअब नहीं होगी खाद की कमी
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Jun 10, 2026,
  • Updated Jun 10, 2026, 7:35 PM IST

भारत की कृषि व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत को बचाना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी के अनुसार, देश में मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है, जो भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है.

मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का करीब 18 प्रतिशत योगदान है और लगभग 46 प्रतिशत आबादी इसी पर निर्भर है. देश ने खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन इसके लिए रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक और असंतुलित उपयोग किया गया है. यही वजह है कि आज 90 प्रतिशत से अधिक भारतीय मिट्टी में नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी है, जबकि करीब 50 प्रतिशत मिट्टी पोटाश की कमी से जूझ रही है.

इसके अलावा जिंक, गंधक, बोरॉन और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी बड़े पैमाने पर देखी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि हरित क्रांति के बाद से अधिक उत्पादन के लिए उर्वरकों के असंतुलित उपयोग ने मिट्टी की क्वालिटी को प्रभावित किया है.

इसका सीधा असर पोषक तत्व उपयोग दक्षता यानी Nutrient Use Efficiency (NUE) पर पड़ा है. कम NUE के कारण किसान न तो फसल की अच्छी क्वालिटी हासिल कर पा रहे हैं और न ही उत्पादन को अधिकतम स्तर तक ले जा पा रहे हैं. इससे खेती की लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है.

भारत में बढ़ता खादों का उपयोग

भारत में उर्वरकों का उपयोग 1951-52 में 65,600 मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 में लगभग 33.54 मिलियन टन तक पहुंच गया है. हालांकि इससे उत्पादन बढ़कर करीब 376 मिलियन टन हो गया, लेकिन इसका खामियाजा मिट्टी की सेहत को भुगतना पड़ा है.

सुरेश कुमार चौधरी की मानें तो अब समय आ गया है कि किसान संतुलित उर्वरक उपयोग की ओर बढ़ें. इसके लिए 4R न्यूट्रिएंट स्टेवार्डशिप मॉडल अपनाने की जरूरत है, जिसमें सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान पर उर्वरक का प्रयोग किया जाता है. इसके साथ ही जैविक खाद, नैनो खाद और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाना होगा. स्लो-रिलीज उर्वरक, वाटर सोल्युबल फर्टिलाइजर और प्रिसिजन फार्मिंग जैसी तकनीकें पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकती हैं.

मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाना जरूरी

मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाना भी जरूरी है, जो वर्तमान में 0.5 प्रतिशत से भी कम है. इसके लिए गोबर, फसल अवशेष और जैविक कचरे का उपयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. तकनीकी दृष्टि से भी खेती को मजबूत बनाने की जरूरत है. GPS, ड्रोन, सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित खेती से संसाधनों का सही उपयोग संभव है और लागत कम की जा सकती है.

नीतिगत स्तर पर भी सुधार जरूरी है. एफएआई के महानिदेशक ने सुझाव देते हुए कहा कि यूरिया को न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी के दायरे में लाना और उर्वरक नीतियों में बदलाव करना संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देगा. कुल मिलाकर, भारत के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वह असंतुलित उर्वरक उपयोग से हटकर संतुलित और टिकाऊ खेती की ओर बढ़े. तभी मिट्टी की सेहत सुधरेगी, उत्पादन बना रहेगा और भविष्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी.

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