कुदरत का खेल या सिस्टम की गलती? रोहतक में खारा पानी बना मुसीबत

कुदरत का खेल या सिस्टम की गलती? रोहतक में खारा पानी बना मुसीबत

रोहतक जिले में भूजल स्तर ऊंचा होने के बावजूद पानी खारा होने की गंभीर समस्या सामने आई है. यह पानी न तो पीने योग्य है और न ही सिंचाई के काम आता है. ऐसे में लोग और किसान पूरी तरह नहरी पानी पर निर्भर हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति जल प्रबंधन और फसल पैटर्न में बदलाव की आवश्यकता दर्शाती है.

रोहतक में पानी की अजीब पहेली!रोहतक में पानी की अजीब पहेली!
सुरेंदर सिंह
  • Rohtak,
  • Jun 10, 2026,
  • Updated Jun 10, 2026, 10:48 AM IST

हरियाणा के रोहतक जिले में पानी को लेकर एक बहुत ही अलग और अजीब स्थिति देखने को मिल रही है. आमतौर पर जब भूजल (जमीन के नीचे का पानी) ऊपर आ जाता है, तो लोगों को राहत मिलती है. लेकिन रोहतक में ऐसा नहीं है. यहां कई इलाकों में पानी जमीन के बहुत करीब, यानी सिर्फ 5 से 25 फीट की गहराई पर मिल जाता है. इसके बावजूद यह पानी पीने के लायक नहीं है और न ही खेती के काम आता है, क्योंकि यह बहुत ज्यादा खारा है. इस वजह से लोग मजबूरी में नहर के पानी पर निर्भर हैं.

नहर का पानी ही बना सहारा

रोहतक जिले के सांपला, महम, कलानौर और आसपास के इलाकों में बड़ी और छोटी नहरों का अच्छा नेटवर्क है. इसी नहरी पानी से किसानों की फसलें सींची जाती हैं और गांवों में पीने के पानी की जरूरत भी पूरी की जाती है. अगर नहर का पानी न हो, तो लोगों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़े.

भूजल खारा क्यों हो गया?

भूमि जल संरक्षण विभाग के अधिकारी दलबीर सिंह के अनुसार, रोहतक में भूजल ऊपर आने का सबसे बड़ा कारण नहरी सिंचाई का ज्यादा उपयोग है. जब लंबे समय तक खेतों में नहर का पानी डाला जाता है, तो जमीन के अंदर पानी का स्तर ऊपर आ जाता है. लेकिन इसके साथ ही पानी में नमक की मात्रा भी बढ़ जाती है, जिससे वह खारा हो जाता है.

विभाग हर साल दो बार गांवों में जाकर पानी के स्तर की जांच करता है और उसका डाटा तैयार करता है.

पुराने समय में कैसा था पानी

अगर हम 1985 के आसपास की बात करें, तो उस समय रोहतक में भूजल 30 से 40 फीट की गहराई पर मिलता था. उस समय यह पानी काफी मीठा था और लोग इसे आसानी से पी सकते थे. उस समय यहां धान की खेती भी बहुत कम होती थी.

लेकिन 1995 में आई बाढ़ के बाद हालात बदलने लगे. बाढ़ के पानी और उसके बाद बढ़ी हुई खेती ने जमीन के पानी पर असर डाला.

धान की खेती और बाढ़ का असर

1995 के बाद किसानों ने बड़े पैमाने पर धान की खेती शुरू कर दी. धान की फसल को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है. इसके लिए नहर का पानी ज्यादा इस्तेमाल किया जाने लगा. इससे भूजल स्तर धीरे-धीरे ऊपर आने लगा. समय के साथ पानी की गुणवत्ता भी खराब होती गई और आज हालात यह हैं कि पानी बहुत ऊपर है, लेकिन पीने लायक नहीं है.

किसान और विशेषज्ञ क्या कहते हैं

डोभ गांव के किसान और किसान सभा के नेता प्रीत सिंह का कहना है कि 1995 की बाढ़ और उसके बाद बढ़ी हुई धान की खेती ने इस समस्या को बढ़ाया है. उनका कहना है कि पानी ऊपर तो आ गया, लेकिन अब वह खारा हो चुका है. इतना खारा कि न तो इसे पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही नहाने या खेतों में उपयोग के लिए.

भूमि जल संरक्षण विभाग के अधिकारी दलबीर सिंह भी मानते हैं कि वर्तमान में कई इलाकों में पानी सिर्फ 5 से 20 फीट की गहराई पर है, लेकिन उसकी गुणवत्ता खराब है.

भविष्य की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि रोहतक में सबसे बड़ी समस्या पानी की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता है. पानी तो बहुत है, लेकिन वह उपयोग के लायक नहीं है. इसलिए भविष्य में जल प्रबंधन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है.

इसके साथ ही फसल का प्रकार बदलना यानी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना भी जरूरी है. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है. रोहतक की यह स्थिति हमें यह सिखाती है कि सिर्फ पानी होना ही काफी नहीं है, बल्कि साफ और उपयोगी पानी होना भी बहुत जरूरी है.

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