
केंद्रीय कृषि सचिव आतिश चंद्रा ने कहा है कि आगामी रबी सीजन बारिश पर निर्भर खेती वाले क्षेत्रों (असिंचित क्षेत्रों) के लिए चुनौतीपूर्ण रह सकता है. अल नीनो के असर के बीच अनाज उत्पादन भी प्रभावित होने की आशंका है. उन्होंने सोमवार को रबी सीजन की तैयारियों पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में यह बात कही. आतिश चंद्रा ने कहा कि इस साल खरीफ सीजन भी खासतौर पर बारिश पर निर्भर इलाकों के लिए मुश्किल रहा है. कई राज्यों में पहले फसलों की बुवाई का क्षेत्र बढ़ाने में दिक्कत आई और बाद में खड़ी फसलों को बचाए रखना चुनौती बना रहा. अक्टूबर से गेहूं और सरसों जैसी प्रमुख रबी फसलों की बुवाई शुरू होती है.
कृषि सचिव ने कहा कि आने वाले रबी सीजन में कुछ क्षेत्रों में मिट्टी में जरूरत से ज्यादा नमी की समस्या सामने आ सकती है, जबकि कम बारिश वाले इलाकों में फसलों को लंबे समय तक नमी की कमी का सामना करना पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि इन अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रबी सीजन की रणनीति तैयार करने की जरूरत है.
आतिश चंद्रा ने जलवायु परिवर्तन को वास्तविकता बताते हुए कहा कि इसका असर सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है. कई जगह बेमौसम और तेज बारिश से फसलों को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि पहले माना जाता था कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां बाद में सामने आएंगी, लेकिन अब इनमें तेजी से बदलाव हो रहा है.
कृषि सचिव ने कहा कि देश में रबी फसलों की बुवाई सामान्य तौर पर करीब 638 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है. इसमें 300 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में गेहूं, करीब 140 लाख हेक्टेयर में दलहन, 87 लाख हेक्टेयर में तिलहन और 55 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज की खेती होती है.
आतिश चंद्रा ने कहा कि भारत ने अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की है, लेकिन देश अब भी दलहन, तिलहन और फलों जैसे कुछ बागवानी उत्पादों के लिए आयात पर निर्भर है. उन्होंने इस स्थिति को देखते हुए फसल विविधीकरण पर जोर दिया.
कृषि सचिव ने कहा कि आत्मनिर्भरता के लिए फसल विविधीकरण जरूरी है, हालांकि इसके सामने अनुसंधान, जलवायु अनुकूलता और किसानों की आय से जुड़ी चुनौतियां हैं. उन्होंने कहा कि विविधीकरण को टिकाऊ कृषि के साथ आगे बढ़ाना होगा. सरकार की प्राथमिकताओं में टिकाऊ खेती शामिल है.
आतिश चंद्रा ने कहा कि ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ और मृदा स्वास्थ्य जैसी योजनाएं लागू की गई हैं, लेकिन इनका आकलन केवल सब्सिडी के वितरण के आधार पर नहीं होना चाहिए. राज्यों को यह देखना होगा कि इन योजनाओं से जमीन पर क्या परिणाम मिल रहे हैं और किसानों की आय में कितना सुधार हो रहा है.
कृषि सचिव ने बुनियादी ढांचे को तीसरी प्राथमिकता बताते हुए कहा कि उत्पादन से पहले और उत्पादन के बाद दोनों स्तरों पर कई कमियां हैं. उन्होंने कृषि ढांचे के आधुनिकीकरण की जरूरत बताई, ताकि फसलों के नुकसान को कम किया जा सके.
उन्होंने कहा कि फलों और सब्जियों के लिए फिलहाल कोई खरीद व्यवस्था नहीं है, जबकि बाजार आधारित मांग के कारण इनका उत्पादन और बाजार दोनों बढ़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि बागवानी क्षेत्र की वृद्धि अब अनाज, दलहन और तिलहन की तुलना में तेज हो रही है.
आतिश चंद्रा ने कहा कि कृषि क्षेत्र में कई सुधार किए गए हैं, लेकिन उनके आसपास बनाए गए कुछ सुरक्षा प्रावधान व्यवहार में इन सुधारों के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन रहे हैं. उन्होंने इन प्रावधानों की समीक्षा की जरूरत बताई.
कृषि सचिव ने डिजिटल कृषि को सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता बताते हुए कहा कि आंकड़ों में असमानता बेहतर योजना बनाने में बाधा डालती है. रबी, खरीफ और जायद फसलों से जुड़े फैसलों के लिए उत्पादन, भूमि क्षेत्र और किसानों से जुड़ा सटीक डेटा जरूरी है.
आतिश चंद्रा ने किसान आईडी पहल को बड़े स्तर का प्रयास बताया. उन्होंने कहा कि किसान आईडी को भूमि रिकॉर्ड से जोड़कर किसानों को कृषि व्यवस्था से जोड़ने की जरूरत है. उनके मुताबिक, अंतिम स्तर तक कनेक्टिविटी कमजोर हुई है और किसान आईडी, भूमि रिकॉर्ड और किसानों को एकीकृत प्रणाली से जोड़कर इसे मजबूत करना होगा.