
लहसुन की खेतीलहसुन की खेती किसानों के लिए कम समय में तैयार होने वाली और अच्छी आमदनी देने वाली फसलों में शामिल है. इसकी मांग बाजार में पूरे साल बनी रहती है, जिससे किसान सही किस्म और बेहतर खेती तकनीक अपनाकर अपनी कमाई बढ़ा सकते हैं. इसी को देखते हुए बिहार सरकार के उद्यान निदेशालय और कृषि विभाग ने किसानों को लहसुन की उन्नत ‘भीमा पर्पल’ किस्म की खेती करने की सलाह दी है. विभाग के मुताबिक यह किस्म बेहतर उत्पादन के साथ किसानों की आय बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है. ऐसे में आइए जानते हैं इस किस्म की खासियत.
लहसुन की अच्छी फसल के लिए पौधों की सही दूरी भी काफी महत्वपूर्ण होती है. भीमा पर्पल की रोपाई के दौरान पौधों के बीच 15 सेंटीमीटर और कतारों के बीच 10 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए. सही दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और खेत में निराई-गुड़ाई और फसल की देखभाल करना भी आसान रहता है. वहीं, इस किस्म की खेती के लिए एक हेक्टेयर खेत में करीब 400 से 500 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. किसानों को स्वस्थ और अच्छी क्वालिटी वाली कलियों को ही रोपण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए. इससे पौधों का विकास बेहतर तरीके से होने में मदद मिलती है.

कृषि विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, भीमा पर्पल की रोपाई अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है. किसानों को खेत तैयार करते समय मिट्टी को भुरभुरा रखने और खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था करने पर ध्यान देना चाहिए. वहीं, भीमा पर्पल लहसुन की फसल करीब 120 से 135 दिन में तैयार हो जाती है. यानी अनुकूल मौसम और सही प्रबंधन के साथ किसान लगभग चार से साढ़े चार महीने में इसकी खुदाई कर सकते हैं. इस अवधि के बाद जब पौधों की पत्तियां सूखने और पीली पड़ने लगें, तब फसल की खुदाई की जाती है.
लहसुन की खेती में किस्म का चुनाव उत्पादन और क्वालिटी पर सीधा असर डालता है. भीमा पर्पल को उन्नत किस्म के तौर पर अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं. फसल की सही समय पर रोपाई, पर्याप्त पोषण, सिंचाई और रोग-कीट प्रबंधन के साथ इसकी खेती से अच्छी उपज लेने में मदद मिल सकती है.
बिहार में मसाला फसलों की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन सकती है. ऐसे में किसान अपने क्षेत्र की मिट्टी और मौसम के अनुसार भीमा पर्पल जैसी उन्नत लहसुन किस्म को खेती में शामिल कर सकते हैं. हालांकि, बीज की मात्रा और खेती से जुड़े स्थानीय सुझाव के लिए किसान अपने नजदीकी कृषि विभाग या उद्यान विभाग के विशेषज्ञों से सलाह जरूर लें.
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