
युद्ध के मैदानों में इंसानी नसों को सुन्न कर देने वाली जिस खौफनाक 'नर्व गैस' (ऑर्गेनोफॉस्फेट) से पूरी दुनिया कांपती थी, आज उसका बदला हुआ रूप डाइमेथोएट (Dimethoate) कीटनाशक के भेष में हमारे खेतों से सीधा रसोई तक पहुंच चुका है. डाइमेथोएट एक इंसेक्टिसाइड (Insecticide) है, इसकी फितरत इतनी मक्कार और जहरीली होती है कि फसलों पर छिड़के जाने के बाद यह खुद तो गायब होने का नाटक करता है, लेकिन टूटकर 'ओमेथिएट' नाम का ऐसा खौफनाक रूप ले लेता है जो मूल केमिकल से भी 10 गुना ज्यादा घातक होता है. अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (US EPA) इसे सीधे तौर पर "संभावित कैंसरकारी" मान चुकी है और दुनिया के 31 जागरूक देशों ने अपने नागरिकों की नस्लों और डीएनए को बचाने के लिए इस पर पूरी तरह से बैन लगा दिया है. लेकिन, भारत में क्या हो रहा है? आप सही सोच रहे हैं. यह बैन होकर भी 'बैन' नहीं है.
श्रीलंका के सुसाइड एपिडेमिक से लेकर यूरोप के फूड-वॉर तक, इस केमिकल का इतिहास केवल इंसानी जिंदगियों की तबाही और मौत के स्याह पन्नों से भरा पड़ा है. विडंबना देखिए कि जिस जानलेवा जहर को विकसित देश कचरे के डिब्बे में फेंक चुके हैं, वह भारत में सरकारी फाइलों की सुस्ती और मुनाफाखोर एग्रोकेमिकल कंपनियों के अरबों रुपये के टर्नओवर की आड़ में आज भी धड़ल्ले से बिक रहा है. हालांकि कागजों पर सरकार ने सब्जियों और फलों पर इसके इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने का ढोंग रचा है, लेकिन जमीनी हकीकत और लचर रेगुलेटरी सिस्टम के कारण यह धीमा जहर आज भी किसानों के हाथों हमारी थाली में परोसा जा रहा है.
डाइमेथोएट का वर्ल्ड वार के रासायनिक युद्ध से गहरा संबंध है, क्योंकि यह उसी 'ऑर्गेनोफॉस्फेट' तकनीक पर आधारित है जिससे दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में सरीन (Sarin) और टैबुन (Tabun) जैसी घातक 'नर्व गैसें' बनाई गई थीं. युद्ध के दौरान जर्मन वैज्ञानिकों ने इंसानों के नर्वस सिस्टम को ठप करने के लिए जिस रासायनिक सिद्धांत की खोज की थी, उसी सिद्धांत का उपयोग युद्ध के बाद अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कीड़ों को मारने के लिए किया. इससे कीड़ों के नर्वस सिस्टम में लकवा मार जाता है और उसकी मौत हो जाती है.
इस प्रकार दूसरे विश्व युद्ध की विनाशकारी नर्व गैस तकनीक को ही बाद में कृषि क्षेत्र में कीटनाशक के रूप में बदला गया. डाइमेथोएट की खोज पहली बार अमेरिका में सन 1951 में हुई थी. इसे अमेरिकी केमिकल कंपनी 'अमेरिकन साइनामिड' के वैज्ञानिकों ने विकसित किया था, साल 1956 में इसे व्यावसायिक रूप से किसानों के लिए बाजार में उतारा गया.
पर्यावरण के नजरिए से डाइमेथोएट का इतिहास एक विलेन जैसा रहा है. यह मधुमक्खियों का दुश्मन है. इसे फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन सहित यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों और चीन में पूरी तरह बैन किया गया है, जबकि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में इस पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं. कुछ साल पहले यूरोप में डाइमेथोएट को लेकर एक बड़ा 'फूड-वॉर' (खाद्य संघर्ष) छिड़ गया था.
विशेषकर फ्रांस ने यूरोपीय संघ के कड़े नियमों से बहुत पहले ही इस पर बैन लगा दिया था क्योंकि वहां के चेरी और फलों के बागानों में इसका जहर पाया गया था. इसके बाद फ्रांस ने उन देशों से फल आयात करने से मना कर दिया जो डाइमेथोएट का इस्तेमाल कर रहे थे. इसने यूरोपीय देशों के बीच व्यापारिक और राजनीतिक तनाव पैदा कर दिया था, जिसके कारण 2019-2020 में पूरे यूरोपीय संघ को इसे पूरी तरह बैन करना पड़ा.
वैज्ञानिक शोधों में पाया गया है कि डाइमेथोएट डीएनए (DNA) को गंभीर नुकसान पहुंचाता है. विज्ञान की भाषा में इसे 'जीनोटॉक्सिक' और 'म्यूटाजेनिक' केमिकल कहा जाता है. इसका मतलब यह है कि इसमें कोशिकाओं के भीतर मौजूद आनुवंशिक सामग्री को सीधे तौर पर विकृत या नष्ट करने की क्षमता होती है. यही कारण है कि लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.
पौधों के संपर्क में आकर यह केमिकल ओमेथिएट (Omethoate) में बदल जाता है, जो मूल दवा से भी 10 गुना अधिक विषैला और खूंखार होता है. यह एक सिस्टेमिक कीटनाशक है. इसका मतलब है कि यह पौधे और फल के रग-रग में समा जाता है. इसलिए फसल के बाजार पहुंचने तक इसके जहरीले अवशेष फलों और सब्जियों में समा चुके होते हैं, जिन्हें सामान्य तौर पर धोकर साफ करना मुमकिन नहीं होता. विकसित देशों का लचर भारतीय व्यवस्था के साथ यही सबसे बड़ा टकराव है.
यूरोपीय संघ (EU) जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों ने हमारी लचर जांच प्रणाली को कई बार बेनकाब करते हुए तय मानकों से अधिक कीटनाशक अवशेष मिलने के कारण यहां से भेजी गई चायपत्ती और मसालों की खेपों को अपने बंदरगाहों से ही बेरहमी से रिजेक्ट करके वापस लौटा दिया है. जो दूषित भोजन विदेशों में इंसानों के खाने लायक भी नहीं समझा गया, कड़े घरेलू टेस्टिंग और कड़े नियमों के अभाव में भारत का आम नागरिक हर दिन उसी 'धीमी मौत' को अपनी रसोई में सजाने और निगलने के लिए पूरी तरह लावारिस छोड़ दिया गया है.
डाइमेथोएट नाम का यह कीटनाशक भारतीय कृषि बाजार में कई ब्रांड नाम से धड़ल्ले से बिक रहा है. यह जहर किसानों के बीच भयानक रूप से लोकप्रिय है, क्योंकि नए सुरक्षित केमिकल की तुलना में यह बेहद सस्ता है. किसानों में इसकी दीवानगी की सबसे बड़ी वजह इसकी 'टू-इन-वन' मारक क्षमता है, जो पौधे के भीतर समाकर रस चूसने वाले कीड़ों के साथ-साथ सीधे संपर्क में आने वाले कीटों को भी एक ही झटके में साफ कर देती है. सफेद मक्खी, थ्रिप्स और माहू जैसे हर मर्ज पर इसके तुरंत और अचूक असर के कारण ही भोले-भाले किसान इसके पीछे छिपे डीएनए की तबाही और कैंसर के खौफनाक खतरों से अनजान होकर इसे खेतों में डाल रहे हैं.
वर्ष 2013-2015 में गठित डॉ. अनुपम वर्मा कमेटी ने कुल 66 कीटनाशकों की समीक्षा की थी, जिसमें से उन्होंने 18 को तुरंत बैन करने और बाकी की समीक्षा करने को कहा था। इसके बाद, कृषि मंत्रालय ने 14 मई 2020 को एक नया ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया, जिसके तहत .डाइमेथोएट (Dimethoate) समेत 27 सबसे घातक कीटनाशकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा गया था. लेकिन एग्रोकेमिकल कंपनियों की ताकतवर लॉबी और नौकरशाही की लेटलतीफी के कारण यह फैसला सालों तक फाइलों में रेंगता रहा.
कंपनियों द्वारा नई कमेटियों के गठन की आड़ में मामले को लटकाने का नतीजा यह हुआ कि सरकार ने एक बीच का रास्ता निकाल लिया. केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIBRC) ने फलों और सब्जियों पर तो कागजी तौर पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन कपास जैसी औद्योगिक फसलों के नाम पर इसके '30% EC फॉर्मूले' के उत्पादन और बिक्री की खुली ढील दे दी. प्रशासनिक लापरवाही की इस नाकामी के चलते कपास के बहाने खेतों में खुलेआम बिक रहा यह जानलेवा धीमा जहर, लचर रेगुलेटरी सिस्टम के कारण अंततः घूम-फिरकर आम भारतीय की थाली तक पहुंच रहा है.
सच्चाई यह है कि डाइमेथोएट के पीछे 'एग्रोकेमिकल लॉबी' का एक बहुत बड़ा आर्थिक संरक्षण खड़ा है. भारतीय कीटनाशक उद्योग में इन 27 पुराने जेनेरिक रसायनों की हिस्सेदारी कंपनियों के कुल घरेलू राजस्व का लगभग 20 प्रतिशत बताई जाती है. देश में हजारों मीट्रिक टन जहर का उत्पादन हर साल हो रहा है. अरबों रुपये के इस टर्नओवर और हजारों नौकरियों का हवाला देकर यह लॉबी सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखती है. उनके लिए किसान या उपभोक्ता की सेहत कोई मायने नहीं रखती; उनके लिए सिर्फ मुनाफे का ग्राफ मायने रखता है. इनके मुनाफे के आगे आम भारतीय की जान की कीमत कौड़ियों के भाव आंकी जा रही है.
सरकार ने कह तो दिया कि सब्जियों और फलों पर इसका इस्तेमाल 'अवैध' है, लेकिन क्या सरकार हर खेत में पहरा देने जाती है? हकीकत यह है कि देश के दूर-दराज के इलाकों में बैठे छोटे किसानों को इन तकनीकी नियमों (जैसे CIBRC के नियम) का कोई ज्ञान नहीं है. चूंकि डाइमेथोएट बाजार में बेहद सस्ता मिलता है और टमाटर, बैंगन, भिंडी या मिर्च में लगने वाले रसचूसक कीड़ों को पल भर में साफ कर देता है, इसलिए किसान बिना सोचे-समझे इसका अंधाधुंध छिड़काव कर रहे हैं.
क्या भारतीय नागरिकों की जान की वाकई कोई कीमत नहीं है? महाराष्ट्र के यवतमाल में साल 2017 में कपास के खेतों में इसी श्रेणी (ऑर्गेनोफॉस्फेट) के कीटनाशकों का छिड़काव करते समय सुरक्षा गियर न होने के कारण जब 20 से ज्यादा किसानों की तड़प-तड़प कर मौत हो गई और सैकड़ों हमेशा के लिए अंधे हो गए, तब देश में हाहाकार मचा था. यह जहर शरीर में जाते ही नर्वस सिस्टम को चोक कर देता है. विकसित देश जहां 'प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल' यानी खतरे की हल्की सी आशंका पर भी पाबंदी वाले सिद्धांत पर काम करते हैं, वहीं हमारे देश में तब तक किसी केमिकल को पूरी तरह से नहीं हटाया जाता जब तक कि कानूनी लड़ाइयां खत्म न हो जाएं.
डाइमेथोएट का यह पूरा खेल सिर्फ एक कीटनाशक का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की खाद्य सुरक्षा और जनस्वास्थ्य नीति के चरित्र पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है. विकसित देशों द्वारा कूड़ेदान में फेंके जा चुके रसायनों को कपास और चाय के बहाने भारतीय खेतों में बने रहने देना यह साबित करता है कि आज भी एग्रो केमिकल कंपनियों का मुनाफा आम नागरिक की जिंदगी और हमारी आने वाली पीढ़ियों के डीएनए से कहीं ज्यादा कीमती बना हुआ है.
जब तक हमारा घरेलू जांच तंत्र अंतरराष्ट्रीय मानकों की तरह सख्त नहीं होगा और जब तक सरकारी फाइलें एग्रोकेमिकल लॉबी के दबाव से मुक्त होकर फैसले नहीं लेंगी, तब तक भारतीय नागरिक अपनी ही थाली में परोसी जा रही इस 'धीमी मौत' को निगलने के लिए मजबूर रहेगा. अब वक्त आ गया है कि कागजी पाबंदियों और बीच के रास्तों के ढोंग को बंद कर खतरनाक केमिकल्स पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाए.
सीरीज की खबरें यहां पढ़ें:
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?