Agriculture Growth Rate: कृषि विकास दर में क‍िसान कहां है? आंकड़ों के धोखे को समझिए

Agriculture Growth Rate: कृषि विकास दर में क‍िसान कहां है? आंकड़ों के धोखे को समझिए

अगर साल-दर-साल देश में फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन बढ़ा है, तो फिर इन्हीं सालों में किसानों की आत्महत्याएं क्यों बढ़ी हैं? खेत में अनाज की बंपर पैदावार होना और उसी अन्नदाता का कर्ज के दलदल में धंसकर दम तोड़ देना क्या यही हमारे विकास का पैमाना है? साफ है कि जिसे हम दशकों से कृषि विकास समझ रहे हैं, वह सिर्फ अनाज का विकास है, किसान का नहीं. ऐसी व‍िकास दर क‍िसान के क‍िस काम की? 

Agriculture Growth RateAgriculture Growth Rate
ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Jul 30, 2026,
  • Updated Jul 30, 2026, 5:04 PM IST

जब भी सरकारें अपनी पीठ थपथपाती हैं या बड़े मंचों से आर्थिक तरक्की का ढोल पीटा जाता है, तो कृषि विकास दर (Agriculture Growth Rate) का आंकड़ा सबसे जोर-शोर से उछाला जाता है. हालिया रिपोर्टों में कृषि अर्थशास्त्री रमेश चंद और जसपाल सिंह ने बताया है कि पिछले दशक (2015-16 से 2024-25) में भारत की कृषि विकास दर 4.45 फीसदी के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गई. दावा यहां तक है कि इस तरक्की ने चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों को भी पीछे छोड़ दिया है.

दूर से देखने पर लगता है कि देश का किसान अमीर हो रहा है, गांवों में खुशहाली की फसल लहलहा रही है. लेकिन क्या वाकई ऐसा है या फिर यह आंकड़ों का एक ऐसा मायाजाल है, डाटा की एक बाजीगरी है...जिसके पीछे किसान की खाली जेब को छुपाया जा रहा है? आईए, समझते हैं क‍ि कैसे कृष‍ि व‍िकास दर में क‍िसान की इनकम है ही नहीं. अगर कृष‍ि व‍िकास दर में क‍िसानों की इनकम का कोई लेना-देना ही नहीं है तो फ‍िर उसका क्या फायदा? 

डिजाइन की बुनियादी खोट

सबसे पहले यह समझिए कि सरकार यह विकास दर निकालती कैसे है. भारत सरकार का सांख्यिकी मंत्रालय कृषि विकास दर (GVA) मापने के लिए प्रोडक्शन अप्रोच का इस्तेमाल करता है. इस आसान से गणित को समझिए. 

* देश के खेतों, तालाबों और डेयरियों में कुल कितना अनाज, फल, दूध या मछली पैदा हुई, सरकार उसकी कुल मात्रा मापती है. उस मात्रा को बाजार के औसत भाव से गुणा किया जाता है और उसमें से खाद, बीज, कीटनाशक और ट्रैक्टर के डीजल जैसी बाहरी लागत को घटा दिया जाता है.

* इसके बाद जो आंकड़ा बचता है, उसे 'कृषि क्षेत्र की तरक्की' मान लिया जाता है. इस पूरे गणित में गायब कौन है? खुद किसान. इस गणना में यह कहीं भी नहीं नापा जाता कि एक किसान परिवार की शुद्ध मासिक आय कितनी बढ़ी, उसके बच्चों की शिक्षा या स्वास्थ्य पर कितना खर्च हुआ, या उस पर कर्ज का बोझ कितना कम हुआ. यह आर्थिक डिजाइन केवल अनाज के वजन की मैपिंग करता है, इंसान की खुशहाली की नहीं. 

रिकॉर्ड पैदावार का दुख 

कहने को लोग यह भी कह सकते हैं क‍ि र‍िकॉर्ड पैदावार होगी तो क‍िसानों को फायदा म‍िलेगा. लेक‍िन हर बार यह बात सही नहीं होती. इस इकोनॉमिक डिजाइन के असली खेल को समझने के लिए देश की मंडियों में हर साल होने वाले टमाटर और प्याज के खेल को देखिए. अर्थशास्त्र में इसे 'बंपर फसल का अभिशाप' (Bumper Harvest Curse) कहा जाता है. मान लीजिए, इस साल मौसम ने साथ दिया और देश के किसानों ने मेहनत करके रिकॉर्ड तोड़ टमाटर की पैदावार की तो कागजों में क्या होगा? 

चूंकि देश में टमाटर या प्याज का उत्पादन बहुत ज्यादा हुआ, इसलिए सरकारी आंकड़ों में कृषि विकास दर रॉकेट की तरह ऊपर भाग जाएगी. अर्थशास्त्री तालियां बजाएंगे कि खेती ने नया इतिहास रच दिया. लेक‍िन, जमीन पर क्या होगा? बाजार और मंडियों में अचानक लाखों टन टमाटर और प्याज आने के कारण कीमतें धड़ाम से फर्श पर गिर जाएंगी. 

मंडियों में टमाटर और प्याज का भाव अचानक 2 किलो या 3 रुपये प्रत‍ि किलो पर आ जाएगा. किसान को अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ेगी . कई बार तो खेत से मंडी तक प्याज और टमाटर ले जाने का गाड़ी-भाड़ा और पल्लेदारी का खर्च भी नहीं निकलता. मजबूरन किसान फसल पर ट्रैक्टर चला देता है या उन्हें सड़कों पर फेंक देता है. हर साल ऐसी तस्वीरें आती हैं. 

नतीजा? आंकड़ों की चमचमाती दुनिया में कृषि विकास दर 'ऐतिहासिक रूप से उच्चतम' दिखाई देगी क्योंकि उत्पादन बढ़ा है. लेकिन जमीनी दुनिया में अपनी लागत तक न निकाल पाने के कारण उसी प्याज और टमाटर को उगाने वाला किसान भारी घाटे और कर्ज के जाल में फंस चुका होगा. यह इस पूरे सिस्टम का सबसे बड़ा मजाक है. 

किसानों के लिए नहीं बना यह डिजाइन  

यह सोचना कि यह सिस्टम किसानों को समृद्ध बनाने में फेल हो रहा है, एक नासमझी होगी. सच यह है कि यह डिजाइन किसानों को समृद्ध बनाने के लिए कभी बनाया ही नहीं गया था. यह मॉडल आजादी के बाद के 1960 और 70 के दशक का है, जब देश भुखमरी से जूझ रहा था. उस वक्त देश की प्राथमिकता थी खाद्य सुरक्षा. यानी कैसे भी करके गोदामों को अनाज से भरना ताकि देश का पेट भरा जा सके. 

आज हम खाद्यान्न में आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि सरप्लस बन चुके हैं. लेकिन हमारा आर्थिक ढांचा आज भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है. आज भी सिस्टम का पूरा ध्यान इस बात पर है कि देश के गोदामों में कितना अनाज और प्याज और टमाटर आया, इस बात पर नहीं कि उसे उगाने वाले किसानों की क‍ितनी तरक्की हुई. 

कृष‍ि और क‍िसान की तरक्की का सवाल 

कोई यह सवाल क्यों नहीं पूछता कि यदि साल-दर-साल देश में फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन बढ़ा है और सरकारें इसे ही किसानों की तरक्की मानती हैं, तो फिर इन्हीं सालों में रिकॉर्ड संख्या में किसानों की आत्महत्याएं क्यों हुई हैं? खेत में अनाज की बंपर पैदावार होना और उसी खेत के मालिक का कर्ज के दलदल में धंसकर दम तोड़ देना क्या यही हमारी कृषि क्रांति का असली पैमाना है? यह विरोधाभास साफ चीख-चीख कर कह रहा है कि जिसे हम दशकों से कृषि विकास समझकर जश्न मना रहे हैं, वह असल में सिर्फ अनाज का विकास है, किसान का विकास नहीं. जब तक फसलों की समृद्धि किसान के घर की खुशहाली में नहीं बदलेगी, तब तक हर सरकारी आंकड़ा सिर्फ एक खोखला छलावा है. 

चरण सिंह से स्वामीनाथन तक...इतिहास की गवाही 

ऐसा नहीं है कि इस विरोधाभास पर देश में कभी आवाज नहीं उठी. देश के सबसे बड़े किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने शुरुआती दशकों से ही नेहरूवादी आर्थिक मॉडल को पुरजोर चुनौती दी थी. साल 1981 में आई अपनी ऐतिहासिक पुस्तक 'इकोनॉमिक नाइटमेयर ऑफ इंडिया' में उन्होंने साफ तौर पर चेताया था कि, 'जब तक देश के किसान या खेतिहर की क्रय शक्ति नहीं बढ़ेगी, तब तक देश में उद्योगों का विकास होना नामुमकिन है' चौधरी का स्पष्ट मानना था कि मौजूदा आर्थिक ताना-बाना केवल शहरों को सस्ता अनाज और कच्चा माल मुहैया कराने के लिए बुना गया है. इस दोषपूर्ण व्यवस्था के कारण बड़े कॉर्पोरेट और शहर तो समृद्ध होते चले गए, लेकिन तपती धूप में खून-पसीना बहाने वाला किसान लगातार कर्ज और दरिद्रता के दलदल में धंसता चला गया. 

इसके बाद, साल 2004-2006 में आए राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट के पांचवें खंड में साफ-साफ लिखा था कि कृषि विकास दर को केवल उत्पादन के पैमाने पर नापना बंद किया जाए. कृषि मंत्रालय की सफलता का एकमात्र पैमाना 'किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि'होना चाहिए. उन्होंने इसके लिए C2+50% का फॉर्मूला भी दिया, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी किसी सरकार ने इस पैमाने को लागू नहीं क‍िया. वजह साफ है यानी जिस दिन विकास दर का पैमाना 'उत्पादन' से बदलकर 'किसान की शुद्ध आय' कर दिया गया, उस दिन कागजी तरक्की का गुब्बारा फूट जाएगा. 

क‍िसान ब‍िना कृष‍ि का ग्रोथ रेट कैसा? 

निचोड़ यह है क‍ि 'कृषि की तरक्की' और 'किसान की तरक्की' दो बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं. कृषि विकास दर का बढ़ना देश के व्यापारियों और  निर्यातकों के लिए तो जश्न की बात हो सकती है, लेकिन जब तक इस विकास दर में किसान के मुनाफे की गारंटी शामिल नहीं होती, तब तक यह किसान के लिए निरर्थक है. अब समय आ गया है कि देश के नीति-निर्माता इस कागजी अर्थशास्त्र के चश्मे को उतारें. 

जब तक हम 'खेती के कुल टर्नओवर' को नापने के बजाय 'किसान की शुद्ध आय' को देश की आर्थिक नीति का मुख्य पैमाना नहीं बनाएंगे, तब तक हर आंकड़ा देश के अन्नदाता के साथ केवल एक मजाक ही रहेगा. इसल‍िए अगली बार जब कोई आपके सामने कृषि विकास दर के रिकॉर्ड का ढोल पीटे, तो उसे सड़क पर फेंका हुआ टमाटर और प्याज की याद दिलाइएगा. उससे सिर्फ एक सवाल पूछिएगा क‍ि इस रिकॉर्ड में मेरे किसान की जेब का हिस्सा कहां है?

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