
देश में यूरिया की कालाबाजारी और औद्योगिक इस्तेमाल (डायवर्जन) पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने एक मास्टर प्लान तैयार कर लिया है. अब यूरिया की हर बोरी का हिसाब सीधे किसान की 'डिजिटल पहचान' यानी फार्मर आईडी (Farmer ID) से जुड़ा होगा.
अब तक यूरिया की खरीद में पारदर्शिता की कमी का फायदा उठाकर इसका बड़ा हिस्सा प्लाईवुड, रेजिन और टेक्सटाइल जैसी इंडस्ट्रीज में डायवर्ट कर दिया जाता था. इस चोरी को रोकने के लिए सरकार ने 'जमीन के हिसाब से खाद' का फॉर्मूला अपनाया है. दो राज्यों में नए मॉडल की टेस्टिंग सफल रही है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल स्थित अपने आवास पर यह जानकारी दी.
1. डिजिटल डेटाबेस का निर्माण: अब तक देशभर में लगभग 9 करोड़ 30 लाख फार्मर आईडी बनाई जा चुकी हैं. सरकार का लक्ष्य जल्द ही इसे 13 करोड़ तक पहुंचाने का है.
2. इस नई प्रणाली का ट्रायल मध्य प्रदेश और हरियाणा में सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है. इन राज्यों में फार्मर आईडी के जरिए वितरण से यूरिया के अवैध डायवर्जन में भारी कमी देखी गई है. किसानों का विरोध भी नहीं हुआ है.
3. जितनी जमीन, उतना यूरिया: अब किसान की आईडी उसकी जमीन के रिकॉर्ड (Land Records) से लिंक होगी. इससे सिस्टम को पता चलेगा कि किसान के पास कितनी जमीन है और उसे वास्तव में कितने यूरिया की जरूरत है.
यूरिया पर सरकार भारी सब्सिडी देती है ताकि किसानों को यह सस्ता मिले. किसानों को यूरिया का एक बैग 266 रुपये में मिलता है, लेकिन अगर सब्सिडी न हो तो वह करीब 2200 की होगी. औद्योगिक ग्रेड यूरिया महंगा होने के कारण फैक्ट्रियां अक्सर कृषि यूरिया को अवैध तरीके से खरीद लेती थीं. जिससे किसान परेशान होते हैं.
फार्मर आईडी (Farmer ID) किसानों के लिए खेती का एक 'डिजिटल पहचान पत्र' या 'आधार कार्ड' की तरह है. यह सरकार के डिजिटल कृषि मिशन का हिस्सा है, यह एक 12 अंकों का खास पहचान नंबर होता है. इस आईडी में किसान की निजी जानकारी के साथ-साथ उसकी जमीन का रिकॉर्ड (Land Records), बैंक खाता और आधार नंबर लिंक होता है. अब इसी के जरिए ही रासायनिक खाद का वितरण होगा.