
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में इन दिनों एक शानदार बदलाव देखने को मिल रहा है, जो न केवल किसानों की जेब भर रहा है बल्कि खेती की बड़ी समस्याओं का हल भी निकाल रहा है. मेरठ के कुशावली गांव के प्रगतिशील किसान विनोद सैनी ने इस बदलाव की शुरुआत की है. विनोद सैनी अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, "पहले हम गन्ने के साथ मिर्च, बैंगन और फ्रेंच बीन्स जैसी फसलें उगाते थे, लेकिन उनमें मेहनत ज्यादा थी और मुनाफा कम. पिछले साल हमने पहली बार ट्रेंच विधि से बोए गए गन्ने की मेड़ों पर मूंगफली की एक लाइन लगाकर ट्रायल किया. हालांकि, बुआई में थोड़ी देरी हो गई थी, फिर भी महज 90 दिनों में हमें करीब 4 क्विंटल मूंगफली मिल गई.
इस कामयाबी से उत्साहित होकर इस साल हमने 6 मार्च को ही सही समय पर बुआई कर दी है, जिससे अब 6 से 7 क्विंटल पैदावार की उम्मीद है. उनके इस मुनाफे को देखकर अब इलाके के कई दूसरे किसानों ने भी इस फसल चक्र को अपनाना शुरू कर दिया है. इस नए सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि किसानों को बहुत कम समय में सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है.
विनोद सैनी के आंकड़ों को समझें, तो मात्र 3 महीने की इस फसल से एक एकड़ में लगभग 45 से 50 हजार रुपये की मूंगफली आसानी से पैदा हो जाती है. अगर इसमें से बीज और बुआई की लागत निकाल भी दें तो किसान के पास 25 से 30 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा सीधे तौर पर बचता है. यह कमाई गन्ने की मुख्य फसल से होने वाली आमदनी के अलावा है, जो किसानों के लिए 'बोनस' की तरह काम कर रही है.
इस सबसे मजेदार बात यह है कि मूंगफली उगाने से मुख्य फसल यानी गन्ने की सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, बल्कि उसकी पैदावार और बढ़ जाती है. विनोद सैनी बताते हैं कि इस तरीके को अपनाने के बाद उनके गन्ने की उपज, जो पहले 350 क्विंटल हुआ करती थी, वह अब बढ़कर 400 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गई है.
ठीक इसी तरह का सफल प्रयोग मेरठ के एक और प्रगतिशील किसान निमेष ने भी किया था, जिनके इस बेहतरीन प्रयास के लिए खुद कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें सम्मानित किया था. इन दोनों किसानों की सफलता और इस बड़े लाभ को देखते हुए, इस साल इलाके के बहुत से दूसरे किसानों ने भी गन्ने के साथ मूंगफली की सह-फसली खेती बड़े चाव से शुरू कर दी है.
दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश को गन्ने का गढ़ माना जाता है, जहाँ सालों से किसान सिर्फ गन्ना, पेड़ी और गेहूं का पारंपरिक फसलचक्र अपनाते आ रहे हैं. इस लगातार एक जैसी खेती की वजह से खेतों की मिट्टी अपनी उपजाऊ शक्ति खो रही थी. दूसरी तरफ, भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है, जिससे देश का एक बड़ा पैसा बाहर चला जाता है.
इस दोहरी समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार 'नेशनल मिशन ऑन Edible Oils-Oilseeds' जैसी नीतियों के जरिए फसलों में विविधता लाने को बढ़ावा दे रही है. इसी कड़ी में किसानों के लिए 'एडिटिव इंटरक्रॉपिंग' यानी मुख्य फसल के साथ अतिरिक्त तेलहन फसल उगाने का यह नया तरीका एक वरदान साबित हो रहा है, जिससे गन्ने की मुख्य पैदावार को सुरक्षित रखते हुए किसान अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं.
इस तकनीक को जमीन पर उतारने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्था सिमिट (CIMMYT) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मोदीपुरम स्थित 'भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान' (ICAR-IIFSR) मिलकर काम कर रहे हैं. संस्थान के सीनियर वैज्ञानिक डॉ. रघुवीर सिंह बताते हैं कि ट्रेंच विधि से गन्ने की दो लाइनों के बीच कम से कम 120 सेंटीमीटर की दूरी रखकर खाली जगह में मूंगफली आसानी से उगाई जा सकती है.
मूंगफली एक दलहनी फसल होने के नाते जमीन में नाइट्रोजन फिक्स करने वाले जीवाणु होते हैं, जिससे खेत को प्राकृतिक खाद मिलती है और प्रति एकड़ करीब 30 से 35 किलो यूरिया ) की कम जरूरत पड़ती है. साथ ही, मूंगफली जमीन पर फैलने वाली फसल है जो 'लिविंग मल्च' का काम करती है.
इससे धूप में पानी उड़ता नहीं और खेत की नमी बची रहती है, जिससे सिंचाई की भी बचत होती है. वैज्ञानिकों ने पाया कि मूंगफली के कारण गन्ने में लगने वाले कीड़ों और बीमारियों का हमला भी काफी कम हो गया है. उनके अनुसार, सही प्रबंधन से किसान प्रति एकड़ 10 से 12 क्विंटल तक भी मूंगफली की उपज ले सकते हैं.
खेती में यह पहली बार हुआ है जब वैज्ञानिकों ने गन्ने की कटाई के बाद उसकी पेड़ी में भी मूंगफली की सफल खेती करके दिखाई है. इसमें मल्चर मशीन की मदद से गन्ने की सूखी पत्तियों को खेत में फैला दिया जाता है, जो खाद और नमी बचाने का काम करती हैं. आमतौर पर गन्ने की बुआई फरवरी-मार्च में होती है और मूंगफली की खास किस्में सिर्फ 90 से 100 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं.
यानी मॉनसून आने से पहले ही मूंगफली की कटाई हो जाती है जो इस इलाके के फसल चक्र के लिए एकदम फिट बैठता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक को अपनाने से पानी, लेबर और खाद के खर्च में भारी कटौती हो रही है. उत्तर प्रदेश का किसान अब वसंत कालीन गन्ने की खेती को काफी पसंद कर रहा है, और यह 'गन्ना-मूंगफली मॉडल' यहां की खेती को सुरक्षित बनाने, पर्यावरण को बचाने और किसानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में एक मील का पत्थर साबित होगा.