
देश के ज्यादातर राज्यों में धान की अगेती किस्मों की रोपाई अब पूरी हो चुकी है. साथ ही कई जगह धान की रोपाई किए 20 से 30 दिन पूरे हो गए हैं. यह समय धान की अच्छी बढ़वार के लिए जितना अहम होता है, उतना ही खतरनाक भी माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान जड़ गलन जैसे रोग तेजी से फैलने लगते हैं. अगर खेत में पानी का सही प्रबंधन न हो, मौसम में गर्मी और उमस बनी रहे या फिर बारिश के कारण जलभराव हो जाए, तो यह बीमारी कुछ ही दिनों में पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है. ऐसे में किसानों को इस समय खेतों की नियमित निगरानी करनी चाहिए, ताकि शुरुआती लक्षण दिखते ही समय पर बचाव के उपाय किए जा सकें और पैदावार पर कोई असर न पड़े.
धान की फसल में जड़ गलन रोग आमतौर पर रोपाई के 20 से 30 दिन बाद दिखाई देना शुरू होता है. इस रोग के लने पर शुरुआत में पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पौधे कमजोर नजर आने लगते हैं. वहीं, धीरे-धीरे पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और पौधे मुरझाने लगते हैं, जबकि खेत में पर्याप्त नमी मौजूद रहती है. अगर ऐसे पौधे को उखाड़कर देखें, तो उसकी जड़ें काली या भूरी होकर सड़ी हुई दिखाई देती हैं. कई बार जड़ें आसानी से टूट जाती हैं और उनमें बदबू भी आने लगती है. इसके अलावा इस बीमारी बढ़ने पर पूरा पौधा सूख सकता है, जिससे खेत में खाली जगह बनने लगती है और उत्पादन घट जाता है.
जड़ गलन रोग फैलने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. सबसे बड़ा कारण खेत में लंबे समय तक पानी का जमा रहना है. दरअसल, लगातार जलभराव होने से जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और उनमें सड़न शुरू हो जाती है. इसके अलावा अगर खेत में पानी की निकासी सही नहीं होती, तो यह बीमारी और तेजी से फैलती है. साथ ही मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होने से पौधों की रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है. वहीं, कई किसान जरूरत से ज्यादा सिंचाई कर देते हैं, जिससे भी जड़ों में सड़न का खतरा बढ़ जाता है.
जल निकासी: अगर धान की फसल को जड़ गलन रोग से बचाना है, तो सबसे पहले खेत में पानी का सही प्रबंधन करें. खेत में जरूरत से ज्यादा पानी जमा न होने दें और अतिरिक्त पानी निकालने के लिए अच्छी जल निकासी की व्यवस्था रखें.
फसल चक्र: हर साल एक ही खेत में लगातार धान की खेती करने की बजाय फसल चक्र अपनाएं. इससे मिट्टी में रोग पैदा करने वाले फफूंद का प्रभाव कम होता है.
खाद के अधिक इस्तेमाल से बचें: रासायनिक उर्वरकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने के बजाय गोबर की सड़ी हुई खाद, कम्पोस्ट या अन्य जैविक खाद का उपयोग करें. इससे मिट्टी की उर्वरता और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
सही से करें सिंचाई: धान की फसल में सिंचाई हमेशा जरूरत के अनुसार करें. न तो खेत को लंबे समय तक सूखा रहने दें और न ही लगातार पानी भरा रहने दें.
फफूंदनाशक का इस्तेमाल: यदि खेत में बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत नजदीकी कृषि वैज्ञानिक या कृषि विभाग के विशेषज्ञ से सलाह लें और उनकी सिफारिश के अनुसार उचित फफूंदनाशक का ही प्रयोग करें.
गिगरानी करते रहें: समय पर निगरानी, सही जल प्रबंधन, संतुलित पोषण और उचित बचाव के उपाय अपनाकर किसान धान की फसल को जड़ गलन रोग से सुरक्षित रख सकते हैं और अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं.