रिकॉर्ड पैदावार के बावजूद गेहूं निर्यात बंद रखेगा भारत! खाद संकट और कमजोर मॉनसून से सरकार सतर्क

रिकॉर्ड पैदावार के बावजूद गेहूं निर्यात बंद रखेगा भारत! खाद संकट और कमजोर मॉनसून से सरकार सतर्क

भारत में रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद सरकार गेहूं निर्यात खोलने के मूड में नहीं है. खाद संकट, महंगे उर्वरक और कमजोर मॉनसून की आशंका के चलते चावल उत्पादन में गिरावट का खतरा है, जिसकी भरपाई गेहूं से करने की रणनीति अपनाई जा रही है.

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रिकॉर्ड पैदावार के बावजूद गेहूं निर्यात बंद रखेगा भारत! खाद संकट और कमजोर मॉनसून से सरकार सतर्कगेहूं पर निर्यात बैन जारी रखेगा भारत

देश में रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद केंद्र सरकार फिलहाल गेहूं निर्यात खोलने के पक्ष में नहीं है. सरकार खाद संकट, बढ़ती उर्वरक कीमतों और संभावित कमजोर मॉनसून को देखते हुए खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है. साल 2025-26 में भारत ने 376.56 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया है. इसके बावजूद आगामी 2026-27 फसल वर्ष के लिए कुल उत्पादन लक्ष्य घटाकर 373.93 मिलियन टन रखा गया है. इसमें चावल का लक्ष्य 151 मिलियन टन और गेहूं का 121.5 मिलियन टन निर्धारित किया गया है.

इसके अलावा, 28.42 मिलियन टन दालें, 18.08 मिलियन टन मिलेट्स और 52.50 मिलियन टन मक्के का लक्ष्य शामिल है. चावल और मक्के के लिए उत्पादन से कम लक्ष्य निर्धारित करने को सावधानी भरा कदम माना जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 'सामान्य से कम' बारिश का अनुमान लगाया है, जिससे मॉनसून पर अल नीनो का खतरा मंडरा रहा है.

चावल उत्पादन पर खतरा, गेहूं बनेगा सहारा

विशेषज्ञों का मानना है कि खाद संकट के चलते यूरिया और फास्फोरस के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे चावल उत्पादन प्रभावित होगा. ऐसे में सरकार गेहूं के जरिए इस संभावित कमी की भरपाई कर सकती है. यही कारण है कि गेहूं निर्यात खोलने की संभावना फिलहाल बहुत कम है. सरकार गेहूं की घरेलू उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को स्थिर रखने के लिए सख्त नीति पर काम कर रही है. इसके तहत ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSS) को पूरी तरह बंद नहीं किया गया है, बल्कि जरूरत पड़ने पर इसे फिर शुरू किया जा सकता है.

मॉनसून और अल निनो की चिंता

भारत मौसम विभाग ने इस साल सामान्य से कम यानी लगभग 90 प्रतिशत बारिश का अनुमान जताया है. अल निनो के असर से मॉनसून कमजोर रहने की आशंका है, जिससे खासकर चावल और मक्का जैसी फसलों पर असर पड़ सकता है. हालांकि सरकार का कहना है कि उत्पादन लक्ष्य तय करने में केवल अल निनो ही वजह नहीं है. अधिकारियों के अनुसार यह लक्ष्य पिछले साल के स्तर के आसपास ही रखा गया है.

निर्यात नीति रहेगी सख्त

ट्रेड पॉलिसी विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक तनाव और मौसम संबंधी अनिश्चितताओं को देखते हुए सरकार सधे हुए और सावधानी के साथ निर्यात नीति अपनाएगी. देश में गेहूं और चावल का पर्याप्त भंडार होने के बावजूद सरकार खाद्य सुरक्षा से समझौता नहीं करना चाहती. फल और सब्जियों जैसे अन्य कृषि उत्पादों पर भी बारिश की कमी का असर पड़ सकता है.

भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इस बार खाद्य संकट गहराने की आशंका जताई जा रही है. इसका बड़ा कारण महंगाई को माना जा रहा है जो पश्चिम एशिया तनाव के बाद सप्लाई चेन के बाधित होने से बड़ा खतरा पैदा कर रही है. इससे भारत भी अछूता नहीं है क्योंकि तेलों के दाम बढ़ने के बाद कई क्षेत्रों पर महंगाई का प्रभाव साफ झलकने लगा है. सरकार खाने-पीने की चीजों की महंगाई को कंट्रोल में रखना चाहती है जिसमें कृषि उत्पादों की बंपर पैदावार मदद करेगी. 

हाल के वर्षों में जारी रणनीति से साफ है कि रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद सरकार जोखिम लेने के मूड में नहीं है. घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए गेहूं निर्यात पर रोक फिलहाल जारी रह सकती है, ताकि संभावित खाद्य संकट से देश को सुरक्षित रखा जा सके.

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