
आज के समय में भारतीय बासमती चावल की खुशबू पूरी दुनिया में फैल रही है. अमेरिका, चीन, और खाड़ी देशों समेत करीब 125 से ज्यादा देशों में भारत से बासमती चावल भेजा जा रहा है. यही वजह है कि बासमती की मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है और देश में इसकी खेती का रकबा भी तेजी से फैल रहा है. साधारण धान के मुकाबले बासमती की खेती में मुनाफा ज्यादा है, जिससे किसानों का रुझान इस तरफ बढ़ रहा है. बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान (BEDF) के संयुक्त निदेशक और वैज्ञानिक डॉ. रितेश शर्मा के मुताबिक, इस समय देश में बासमती की करीब 33 किस्में मौजूद हैं. अगर किसान नर्सरी तैयार करने से लेकर पौधों की रोपाई तक कुछ खास और वैज्ञानिक बातों का ध्यान रखें तो वे बहुत कम लागत में बंपर और बेहतरीन क्वालिटी की पैदावार ले सकते हैं.
बासमती की अच्छी फसल के लिए सबसे पहला कदम है सही बीज और सही खेत का चुनाव करना. डॉ. रितेश शर्मा सलाह देते हैं कि किसानों को हमेशा सरकारी या प्रमाणित अनुसंधान केंद्रों से ही बासमती के प्रामाणिक बीज खरीदने चाहिए. ध्यान रखें कि प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 25 से 30 किलोग्राम बीज काफी होता है. नर्सरी बनाने के लिए सबसे पहले खेत को लेजर लेवलर से समतलकर लें और छोटी-छोटी क्यारियां बना लें.
बीजों को क्यारी में डालने से पहले उनका शुद्धीकरण करना बहुत जरूरी है. इसके लिए एक बाल्टी में 10 लीटर पानी लें और उसमें बीज डालें; जो हल्के और खराब बीज तैरने लगें, उन्हें छानकर अलग कर दें. भारी और अच्छे बीजों को साफ पानी से दो बार धो लें, ताकि आगे चलकर पौधे स्वस्थ और मजबूत तैयार हों.
बीजों को बीमारियों और सड़न से बचाने के लिए उनका जैविक उपचार करना सबसे जरूरी काम है. इसके लिए प्रति किलो बीज में 5 से 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर और 10 ग्राम स्यूडोमोनास मिलाकर पानी के घोल में 10 किलो बीज को 24 घंटे के लिए भिगोकर रखें. इसके बाद बीजों को पानी से निकालकर जूट के बोरे में या किसी छायादार जगह पर 24 घंटे के लिए अंकुरित होने के लिए रख दें, और नमी बनाए रखने के लिए हल्का पानी छिड़कते रहें.
1 किलो बीज बोने के लिए कम से कम 25 वर्ग मीटर की नर्सरी क्यारी की जरूरत होती है. क्यारी की आखिरी जुताई के समय नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक और आयरन खाद की सही मात्रा दें. इसके बाद शाम के समय, जब क्यारी में 2-3 सेंटीमीटर पानी भरा हो, तो इन अंकुरित बीजों को बराबर मात्रा में छिड़क दें.
नर्सरी में जब पौधे तैयार हो जाएं तो उन्हें कभी भी सूखे में न उखाड़ें, बल्कि हमेशा पानी भरकर ही उखाड़ें. रोपाई से ठीक पहले पौधों की जड़ों का उपचार करना जरूरी है. इसके लिए खेत के पास ही एक छोटा गड्ढा बनाकर 10 लीटर पानी में 100 ग्राम ट्राइकोडर्मा और 100 ग्राम स्यूडोमोनास का घोल बना लें और पौधों की जड़ों को इसमें डुबाकर ही रोपें.
इसके साथ ही, मुख्य खेत की तैयारी के लिए रबी फसल की कटाई के बाद खेत को समतल कर लें और हरी खाद जैसे ढैंचा, सनई या मूंग की बुवाई करें. रोपाई से पहले खेत में पानी भरकर इस हरी खाद को पडलिंग के जरिए मिट्टी में पलट दें.
इससे खाद का खर्च बहुत कम हो जाता है. मिट्टी की जांच के आधार पर आखिरी जुताई के वक्त जरूरी पोषक तत्व दें और साथ ही 2 किलो ट्राइकोडर्मा को 50 किलो सड़ी गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट में मिलाकर पूरे खेत में बिखेर दें.
बासमती धान की रोपाई हमेशा सही उम्र के पौधों की ही करनी चाहिए. आम तौर पर 20 से 25 दिन के पौधे रोपाई के लिए सही होते हैं, लेकिन पूसा बासमती 1509 के लिए 18 से 22 दिन के पौधे सबसे अच्छे माने जाते हैं. रोपाई से ठीक पहले पौधों के ऊपरी हिस्से को 3 से 4 सेंटीमीटर तोड़ दें, जिससे कीड़ों का खतरा कम हो जाता है.
रोपाई हमेशा लाइनों (में करें, जिसमें लाइन से लाइन और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर होनी चाहिए, और गहराई 2-3 सेंटीमीटर से ज्यादा न हो. हर 2-3 मीटर की रोपाई के बाद बीच में 40 सेंटीमीटर का खाली रास्ता छोड़ दें, जिससे हवा और सूरज की रोशनी अंदर तक जाए और बीमारियां न लगें.
सबसे जरूरी बात, रोपाई के 15 से 25 दिनों के भीतर खेत में पानी भरकर 15 से 18 किलो का हल्का पाटा एक से दो बार जरूर चलाएं, इससे धान में फुटाव बहुत अधिक निकलते हैं और पैदावार शानदार होती है.