
खरीफ सीजन में धान की खेती शुरू होते ही किसानों की सबसे बड़ी चिंता फसल को कीटों और रोगों से बचाने की होती है. खासकर पौध तैयार होने से लेकर रोपाई के 30-40 दिनों तक का समय बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यदि इस दौरान कीट या रोग का हमला हो जाए और समय पर नियंत्रण न किया जाए, तो उत्पादन में 20 से 50 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है. ऐसे में किसानों के लिए यह जानना जरूरी है कि धान की शुरुआती अवस्था में कौन-कौन से कीट और रोग सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है. आइए जानते हैं.
1. तना छेदक: धान की शुरुआती अवस्था में तना छेदक सबसे खतरनाक कीटों में से एक माना जाता है. इसकी सूंडी पौधे के तने के अंदर घुस जाती है और अंदर ही अंदर तने को खाती रहती है. इसके कारण पौधे की बीच वाली पत्ती सूख जाती है और हल्के से खींचने पर आसानी से बाहर निकल आती है. इस स्थिति को 'डेड हार्ट' कहा जाता है. यदि समय रहते इस कीट पर नियंत्रण नहीं किया जाए, तो पौधों की संख्या कम हो जाती है और उपज पर सीधा असर पड़ता है. इससे बचाव के लिए किसानों को नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करना चाहिए. प्रभावित पौधों को तुरंत निकालकर नष्ट कर दें ताकि कीट दूसरे पौधों में न फैले. साथ ही खेत की साफ-सफाई बनाए रखें और जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार कीटनाशक का ही प्रयोग करें.
2. पत्ती लपेटक कीट: पत्ती लपेटक कीट धान की पत्तियों को मोड़कर उनके अंदर छिप जाता है और पत्तियों के हरे भाग को खाकर नुकसान पहुंचाता है. इसके कारण पत्तियां सफेद या झुलसी हुई दिखाई देने लगती हैं. जब हरा भाग नष्ट हो जाता है तो पौधे की प्रकाश संश्लेषण की क्षमता कम हो जाती है, जिससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है और उत्पादन घटने लगता है. इस कीट का प्रकोप अधिक नाइट्रोजन वाली फसल में तेजी से बढ़ता है. इसलिए किसानों को शुरुआती अवस्था में जरूरत से ज्यादा यूरिया या नाइट्रोजन वाले उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना चाहिए. वहीं, समय-समय पर खेत की निगरानी करें.
3. हरा फुदका: हरा फुदका आकार में छोटा लेकिन बेहद नुकसानदायक कीट होता है. यह धान की पत्तियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर बना देता है. इसके हमले से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि यह कई वायरस जनित रोगों को भी एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैलाने का काम करता है, जिससे पूरी फसल प्रभावित हो सकती है. इस कीट से बचाव के लिए खेत को हमेशा खरपतवार मुक्त रखें, क्योंकि खरपतवार इसके छिपने और बढ़ने का स्थान बन जाते हैं।. वहीं, संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करें और खेत में नियमित निगरानी रखें. यदि कीटों की संख्या बढ़ने लगे तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर उचित कीटनाशक का प्रयोग करें.
4. शीथ ब्लाइट: शीथ ब्लाइट धान का एक प्रमुख फफूंद जनित रोग है, जो अधिक नमी और घनी रोपाई वाले खेतों में तेजी से फैलता है. इस रोग में सबसे पहले पत्तियों के निचले भाग और तनों पर भूरे या धूसर रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. धीरे-धीरे ये धब्बे बड़े होकर पूरी पत्ती और तने को प्रभावित कर देते हैं. इससे बचाव के लिए खेत में जलभराव न होने दें और उचित जल निकासी की व्यवस्था रखें. पौधों की रोपाई उचित दूरी पर करें ताकि हवा का संचार बना रहे. यदि रोग का प्रकोप बढ़ने लगे तो कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार फफूंदनाशी का छिड़काव करें.
5. जीवाणु झुलसा: जीवाणु झुलसा धान का एक गंभीर जीवाणु जनित रोग है. इसमें सबसे पहले पत्तियों के किनारों से पीलापन शुरू होता है, जो धीरे-धीरे पूरे पत्ते में फैल जाता है. बाद में पत्तियां सूखने लगती हैं और पौधे की बढ़वार प्रभावित होती है. लगातार बारिश, तेज हवा और अधिक नमी वाले मौसम में यह रोग तेजी से फैलता है. यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया जाए तो उत्पादन में भारी कमी आ सकती है. इससे बचाव के लिए किसानों को खेत में जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन वाले उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और संक्रमित पौधों को तुरंत अलग करके नष्ट कर देना चाहिए. साथ ही खेत की नियमित निगरानी करते रहें ताकि रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही समय पर नियंत्रण किया जा सके.
धान की अच्छी पैदावार के लिए केवल खाद और सिंचाई ही पर्याप्त नहीं है. किसान सप्ताह में कम से कम एक-दो बार खेत का निरीक्षण जरूर करें. कीट या रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही तुरंत कृषि वैज्ञानिक या कृषि विभाग से सलाह लें. संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें, खेत में जलभराव और खरपतवार पर नियंत्रण रखें और केवल आवश्यकता होने पर ही अनुशंसित कीटनाशक या फफूंदनाशी का उपयोग करें.