
मॉनसून के इस मौसम में जब तापमान 30 से 31 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है, तब गन्ने की फसल पर कई प्रकार की बीमारियों का खतरा बहुत तेजी से बढ़ जाता है. उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस समय खेतों में बैक्टीरिया (जीवाणु) से पैदा होने वाली बीमारियों का अनुकूल समय चल रहा है. अगर किसान समय रहते अपने खेतों की निगरानी नहीं करते हैं, तो यह बैक्टीरियल बीमारी पूरी फसल को तबाह कर सकती है. इसलिए वैज्ञानिकों ने किसानों को सजग रहने और बीमारी के शुरुआती लक्षणों को पहचानकर सही समय पर फसल की सुरक्षा करने की खास सलाह दी है.
उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद के वैज्ञानिकों ने बताया कि बैक्टीरिया का आक्रमण सबसे पहले पौधे की ऊपरी और साइड की पत्तियों पर दिखाई देता है. शुरुआती अवस्था में पत्तियों पर पानी से भीगी हुई जैसी लंबी 'जलीय धारियां' बनने लगती हैं. इस शुरुआती स्टेज को वैज्ञानिक 'रेड स्ट्रिप डिजीज़' (Red Stripe Disease) कहते हैं. यह बीमारी मुख्य रूप से Acidovorax avenae नामक बैक्टीरिया से फैलती है, जो जून के महीने में उच्च तापमान में पनपना शुरू होता है. अक्सर किसान मध्य सिरा (लीफ वेन) के लाल होने पर इसे 'रेड रॉट' (लाल सड़न) समझने की भूल कर बैठते हैं, लेकिन यह रेड रॉट नहीं बल्कि बैक्टीरिया का ही शुरुआती हमला होता है.
वैज्ञानिकों के अनुसार, बरसात का मौसम आते ही यह बीमारी अपना रूप बदल लेती है और बहुत ही खतरनाक स्टेज 'बैक्टेरियल टॉप रॉट' (Bacterial Top Rot) में चली जाती है. इस गंभीर अवस्था में गन्ने के ऊपरी हिस्से यानी गोफ की पत्तियों में ऊपर से सूखापन (dryness) आने लगता है. जब आप बीच की सबसे छोटी पत्ती को थोड़ा सा जोर लगाकर ऊपर की तरफ खींचते हैं, तो वह बहुत ही आसानी से बाहर निकल आती है. बाहर निकाली गई इस पत्ती के नीचे सड़न महसूस होती है और उससे लप्सी जैसा तरल पदार्थ निकलता है. इस सड़ी हुई गोफ़ से इतनी तेज दुर्गंध आती है कि उसे बर्दाश्त करना भी मुश्किल हो जाता है.
उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद के वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि जब बैक्टेरियल टॉप रॉट का प्रकोप खेत में बहुत अधिक (severe) हो जाता है, तो पौधे का ऊपरी विकास पूरी तरह रुक जाता है. गन्ने की पोरियां (Internodes) छोटी रह जाती हैं और पौधा बौना हो जाता है. सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि गन्ने के ऊपरी हिस्से की साइड वाली आंखें अपने आप अंकुरित (Sprout) होने लगती हैं. गन्ने का विकास रुकने से वजन घट जाता है और धीरे-धीरे पूरा गन्ना सूखकर बेकार हो जाता है. अगर समय रहते इसका इलाज न किया जाए, तो किसान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
बीमारी से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने तुरंत उपचार करने पर जोर दिया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस तरह इंसानों में बुखार या बैक्टीरियल इन्फेक्शन को खत्म करने के लिए एंटीबायोटिक (Antibiotics) का उपयोग किया जाता है, ठीक उसी तरह गन्ने की फसल में भी बैक्टीरिया को नियंत्रित करने के लिए एंटीबायोटिक और कवकनाशी का छिड़काव बेहद जरूरी है. इसके लिए किसान अपने खेत में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के साथ स्ट्रैप्टोसाइक्लिन (या कोई उपयुक्त एंटीबायोटिक) का मिलाकर छिड़काव करें. साथ ही, जलभराव न होने दें और संक्रमित पौधों के अवशेषों को खेत से निकालकर नष्ट कर दें ताकि बीमारी आगे न फैले.