धान में ‘राइस ड्वार्फ’ बीमारी का खतरा, PAU ने बिना सलाह कीटनाशक न छिड़कने की दी सलाह

धान में ‘राइस ड्वार्फ’ बीमारी का खतरा, PAU ने बिना सलाह कीटनाशक न छिड़कने की दी सलाह

पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) और फिरोजपुर कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) ने किसानों को धान में फैल रही ‘राइस ड्वार्फ’ बीमारी को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है. विशेषज्ञों के अनुसार यह वायरस जनित रोग व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर कीट से फैलता है, जिससे पौधे बौने रह जाते हैं और पैदावार पर गंभीर असर पड़ता है. किसानों को नियमित रूप से खेतों की निगरानी करने, संक्रमित पौधों को हटाने और केवल विशेषज्ञों की सलाह पर ही कीटनाशकों का उपयोग करने की अपील की गई है.

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क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Jul 23, 2026,
  • Updated Jul 23, 2026, 5:56 PM IST

पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) ने फिरोजपुर जिले के कई गांवों में किए गए सर्वे के बाद किसानों से 'राइस ड्वार्फ' (धान का बौनापन) बीमारी को लेकर सतर्क रहने और विशेषज्ञों की सलाह के बिना कीटनाशकों का इस्तेमाल न करने की अपील की है. फिरोजपुर के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) ने भी कुछ ऐसी ही सलाह दी है. KVK की टीम ने डिप्टी डायरेक्टर डॉ. गुरमेल सिंह संधू की देखरेख में कई गांवों में धान के खेतों का सर्वे किया ताकि बीमारी के असर का पता लगाया जा सके.

डॉ. संधू ने किसानों को सलाह दी कि वे समय-समय पर अपने खेतों की जांच करें और कीटों या बीमारियों के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें. उन्होंने जोर दिया कि कीटनाशकों का इस्तेमाल केवल कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए और अगर किसानों को कोई संदिग्ध लक्षण दिखाई दें तो उन्हें तुरंत कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करना चाहिए. उन्होंने कहा कि समय पर निगरानी और वैज्ञानिक तरीके से फसल का प्रबंधन करके बड़े आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है.

इस वायरस से होती है राइस ड्वार्फ बीमारी

तकनीकी जानकारी देते हुए असिस्टेंट प्रोफेसर (प्लांट प्रोटेक्शन) डॉ. हरविंदर सिंह बटर ने बताया कि 'राइस ड्वार्फ' बीमारी एक वायरस के कारण होती है, जिससे पौधे बौने रह जाते हैं, उनकी पत्तियां नुकीली होती हैं और जड़ें ठीक से तैयार नहीं हो पातीं. संक्रमित पौधे अक्सर स्वस्थ पौधों की ऊंचाई के आधे या एक-तिहाई ही रह जाते हैं. गंभीर मामलों में, बालियों में दाने नहीं बन पाते और पौधे अंततः मुरझाकर सूख सकते हैं, जिससे पैदावार में भारी नुकसान होता है.

उन्होंने आगे बताया कि यह बीमारी धान की सभी किस्मों को प्रभावित कर सकती है और यह 'व्हाइट-बैक्ड प्लांटहॉपर' कीट से फैलती है. इसलिए, वायरस को फैलने से रोकने के लिए शुरुआती चरण में ही इस कीट की पहचान करना और उसे नियंत्रित करना बहुत जरूरी है. इसके निम्फ (कीट के बच्चे) शुरू में हल्के भूरे-सफेद रंग के होते हैं और बाद में गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं, जबकि वयस्क कीट की पहचान उसकी पीठ पर बनी पतली सफेद पट्टी और उसके अगले पंखों के पिछले हिस्से पर बने साफ काले धब्बे से की जा सकती है.

राइस ड्वार्फ बीमारी के लक्षणों की पहचान

डॉ. संधू ने किसानों को सलाह दी कि वे कम से कम हफ्ते में एक बार अपने खेतों का सर्वे करें. 'व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर' की मौजूदगी का पता लगाने के लिए, किसानों को धान के पौधों को धीरे से झुकाकर दो-तीन बार हिलाना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या निम्फ या वयस्क कीट खेत में खड़े पानी पर तैर रहे हैं. अगर कीटों की संख्या तय सीमा (थ्रेशोल्ड) तक पहुंच जाती है, तो PAU की सिफारिशों के अनुसार ही कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. 

उन्होंने कीड़ों पर नजर रखने के लिए रात में खेतों के पास लाइट बल्ब लगाने का भी सुझाव दिया, क्योंकि ये कीड़े रोशनी की ओर आकर्षित होते हैं. किसानों को यह भी सलाह दी गई कि बीमारी को फैलने से रोकने के लिए शुरुआती चरण में ही संक्रमित पौधों को उखाड़कर गहराई में दबा दें. खेत की मेड़ों और सिंचाई की नालियों को खरपतवार-मुक्त रखना, पिछले साल प्रभावित हुए खेतों पर कड़ी नजर रखना और नाइट्रोजन फर्टिलाइजर का इस्तेमाल केवल बताई गई मात्रा में करना भी मुख्य सुझावों में शामिल थे.

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