
विदिशा जिले के किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों से जोड़ने के उद्देश्य से आईसीएआर-भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल में विकासखंड विदिशा एवं गंजबासौदा से पहुंचे करीब 70 किसानों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया.प्रशिक्षण में किसानों को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती, फसल अवशेष प्रबंधन, टिकाऊ कृषि पद्धतियों के साथ-साथ कार्बन क्रेडिट जैसे नए अवसरों की भी जानकारी दी गई.
कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को ऐसी तकनीकों से परिचित कराना रहा, जिनसे खेती की लागत कम करने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, उत्पादन बढ़ाने और कृषि को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद मिल सके. किसानों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देने के बजाय संस्थान के लाइव डेमो प्लॉट और फील्ड क्षेत्रों का भ्रमण कराकर आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया.
प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों को मृदा परीक्षण और पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व की जानकारी दी.किसानों को बताया गया कि खेत की मिट्टी की वास्तविक स्थिति जानने के बाद उसकी आवश्यकता के अनुसार ही उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए.
विशेषज्ञों ने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) को टिकाऊ खेती के लिए महत्वपूर्ण बताया. इससे अनावश्यक उर्वरक उपयोग और खेती की लागत को कम करने के साथ मिट्टी की उर्वरता तथा फसल की उत्पादन क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिल सकती है.
किसानों को फसल विविधीकरण, खेत समतलीकरण और नरवाई प्रबंधन के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई.विशेषज्ञों ने फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनके वैज्ञानिक प्रबंधन की सलाह दी.
किसानों को समझाया गया कि फसल अवशेषों के बेहतर प्रबंधन से मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। नरवाई जलाने से होने वाले नुकसान और उसके विकल्पों के बारे में भी किसानों को व्यावहारिक जानकारी दी गई.
प्रशिक्षण कार्यक्रम की खास बात यह रही कि किसानों को संस्थान के विभिन्न लाइव डेमो प्लॉट और फील्ड क्षेत्रों का भ्रमण कराया गया. यहां किसानों ने आधुनिक कृषि तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखा और वैज्ञानिकों से उनके उपयोग की जानकारी ली.
इस दौरान किसानों को वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने, प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाले जीवामृत, नीमास्त्र और अग्निअस्त्र बनाने तथा उनके उपयोग की प्रक्रिया का लाइव प्रदर्शन कराया गया. विभिन्न फसलों में रोग प्रबंधन और मृदा स्वास्थ्य सुधार के वैज्ञानिक उपायों की जानकारी भी दी गई.
प्रशिक्षण में कार्बन क्रेडिट और कार्बन आधारित कृषि पद्धतियों पर विशेष सत्र आयोजित किया गया. किसानों को बताया गया कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, फसल अवशेषों का बेहतर प्रबंधन, मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाना और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाना कार्बन उत्सर्जन कम करने में योगदान दे सकता है.
किसानों को यह भी समझाया गया कि निर्धारित प्रक्रियाओं और संबंधित कार्बन परियोजनाओं के माध्यम से टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने वाले किसानों के लिए भविष्य में कार्बन क्रेडिट से अतिरिक्त आय के अवसर विकसित हो सकते हैं।.इसी उद्देश्य से किसानों के लिए विशेष ‘कार्बन पाठशाला’ का आयोजन किया गया.
भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान के भ्रमण के दौरान किसानों ने विभिन्न फसलों और उन्नत कृषि तकनीकों का अवलोकन किया.लाइव डेमो प्लॉट में किसानों ने सोयाबीन की उन्नत खेती सहित अन्य तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखा.
वैज्ञानिकों ने किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त करने, मिट्टी के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने और फसलों में संतुलित मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करने के बारे में जानकारी दी. किसानों ने वैज्ञानिकों से खेती से जुड़ी अपनी समस्याओं और जिज्ञासाओं पर चर्चा कर समाधान भी जाना.
कार्यक्रम में भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. मनोरंजन मोहंती सहित डॉ. संगीता लेंका, डॉ. बी.पी. मीना, डॉ. एन.के. लेंका, डॉ. निशांत सिन्हा, डॉ. वसंधा, डॉ. जे.के. ठाकुर, तपन अधिकारी एवं डॉ. ज्योति सहित संस्थान के वैज्ञानिक और विशेषज्ञ उपस्थित रहे.वैज्ञानिकों ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य, पोषक तत्व प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, फसल प्रबंधन और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी .
प्रशिक्षण के बाद किसानों ने बताया कि संस्थान में उन्हें सिर्फ किताबी जानकारी नहीं मिली, बल्कि लाइव डेमो और फील्ड विजिट के जरिए खेती की तकनीकों को जमीन पर समझने का अवसर भी मिला.
मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक कृषि तकनीक, फसल अवशेष प्रबंधन और मृदा स्वास्थ्य सुधार जैसे उपायों को अपनाकर किसान खेती की लागत कम करने के साथ उत्पादन और आय बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.
कुल मिलाकर यह प्रशिक्षण किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, पर्यावरण अनुकूल खेती और टिकाऊ कृषि की दिशा में आगे बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ. वहीं, कार्बन क्रेडिट जैसे नए अवसरों की जानकारी मिलने से किसानों के लिए खेती को भविष्य में अधिक टिकाऊ और आर्थिक रूप से लाभकारी बनाने की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं.