
देश के प्रमुख धान अनुसंधान संस्थान ICAR-नेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-CRRI), कटक ने किसानों के लिए विस्तृत कृषि परामर्श जारी किया है. संस्थान ने कहा है कि बेहतर उत्पादन के लिए धान की रोपाई अगस्त के दूसरे पखवाड़े तक हर हाल में पूरी कर लेनी चाहिए. साथ ही अलग-अलग अवधि वाली किस्मों और हाइब्रिड धान के लिए अलग-अलग उर्वरक प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई है.
विशेषज्ञों के अनुसार रोपाई में देरी, असंतुलित खाद प्रबंधन और कीट-रोगों की अनदेखी से उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. ऐसे में किसानों को खेत तैयार करने से लेकर फसल की बढ़वार और बाली निकलने तक वैज्ञानिक सिफारिशों का पालन करना चाहिए.
संस्थान ने सलाह दी है कि मध्यम और लंबी अवधि वाली धान की किस्मों में अंतिम जुताई और पडलिंग के समय प्रति एकड़ 4 किलोग्राम यूरिया, 35 किलोग्राम डीएपी और 27 किलोग्राम एमओपी का प्रयोग करें. वैकल्पिक रूप से 18 किलोग्राम यूरिया, 100 किलोग्राम एसएसपी और 27 किलोग्राम एमओपी भी डाला जा सकता है.
रोपाई के 30 दिन बाद पहली टॉप ड्रेसिंग के रूप में 36 किलोग्राम यूरिया और बाली निकलने की शुरुआती अवस्था में दूसरी टॉप ड्रेसिंग के तौर पर 18 किलोग्राम यूरिया डालने की सलाह दी गई है. इस श्रेणी की किस्मों के लिए प्रति एकड़ 32:16:16 किलोग्राम एनपीके की अनुशंसित मात्रा निर्धारित की गई है.
कम अवधि वाली धान की किस्मों के लिए खेत तैयार करते समय प्रति एकड़ 21 किलोग्राम यूरिया, 35 किलोग्राम डीएपी और 27 किलोग्राम एमओपी का उपयोग करने की सलाह दी गई है. किसान चाहें तो 27 किलोग्राम यूरिया, 100 किलोग्राम एसएसपी और 27 किलोग्राम एमओपी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
ऐसी किस्मों में रोपाई के 25 से 30 दिन बाद 27 किलोग्राम यूरिया की टॉप ड्रेसिंग करनी चाहिए. विशेषज्ञों का कहना है कि नाइट्रोजन की आधी मात्रा बेसल डोज और बाकी आधी टॉप ड्रेसिंग के रूप में देना लाभकारी रहेगा.
हाइब्रिड धान में पोषक तत्वों की जरूरत अपेक्षाकृत अधिक होती है. इसके लिए अंतिम खेत तैयारी के समय प्रति एकड़ 32 किलोग्राम यूरिया, 53 किलोग्राम डीएपी और 40 किलोग्राम एमओपी डालने की सलाह दी गई है. वैकल्पिक व्यवस्था में 52 किलोग्राम यूरिया, 150 किलोग्राम एसएसपी और 40 किलोग्राम एमओपी का उपयोग किया जा सकता है.
रोपाई के 30 दिन बाद 26 किलोग्राम यूरिया और बाली बनने की शुरुआती अवस्था में फिर 26 किलोग्राम यूरिया देने की सिफारिश की गई है.
जिन क्षेत्रों की मिट्टी में जिंक की कमी है, वहां खेत तैयार करते समय 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट या 6 किलोग्राम जिंक-ईडीटीए प्रति एकड़ डालने की सलाह दी गई है. यदि जिंक का प्रयोग पहले नहीं किया गया है तो रोपाई के 30 और 45 दिन बाद जिंक-ईडीटीए का छिड़काव किया जा सकता है.
वहीं बोरॉन की कमी वाली मिट्टियों में 4 किलोग्राम बोरेक्स प्रति एकड़ डालने की सिफारिश की गई है. जिन किसानों के पास सॉइल हेल्थ कार्ड हैं, उन्हें कार्ड में दिए गए पोषण प्रबंधन संबंधी निर्देशों का पालन करने को कहा गया है.
विशेषज्ञों ने 25 से 30 दिन पुराने पौधों की रोपाई 20×15 सेंटीमीटर दूरी पर करने की सलाह दी है. अधिक उपज देने वाली किस्मों में प्रति हिल 2 से 3 पौधे और हाइब्रिड धान में 1 से 2 पौधे ही लगाने चाहिए.
यदि रोपाई में देरी हो जाए तो अधिक उम्र के पौधों को 15×15 सेंटीमीटर दूरी पर कम गहराई में रोपने और प्रति हिल 4 से 5 पौधे लगाने की सलाह दी गई है.
धान की फसल में येलो स्टेम बोरर और लीफ फोल्डर की निगरानी के लिए प्रति एकड़ 4 से 5 फेरोमोन ट्रैप लगाने की सिफारिश की गई है. कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर तक पहुंचने पर नीम आधारित जैविक उत्पादों या अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है.
विशेषज्ञों ने ट्राइकोगामा जैपोनिकम और ट्राइकोगामा चिलोनिस जैसे जैविक नियंत्रण एजेंटों के उपयोग पर भी जोर दिया है. इससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी.
ब्राउन प्लांटहॉपर (बीपीएच) का प्रकोप बढ़ने पर खेत में लगातार पानी भरा रखने के बजाय वैकल्पिक गीला-सूखा (AWD) तकनीक अपनाने की सलाह दी गई है. यदि प्रकोप जारी रहे तो अनुशंसित कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है.
इसके अलावा गॉल मिज, हिस्पा, केस वर्म और स्वार्मिंग कैटरपिलर जैसे कीटों की निगरानी कर समय रहते नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी गई है.
आईसीएआर-सीआरआरआई के अनुसार यदि प्रति पौधा 1 से 2 टिलर में शीथ ब्लाइट के लक्षण दिखाई दें तो तुरंत फफूंदनाशकों का छिड़काव करना चाहिए. रोग की तीव्रता के अनुसार 7 से 10 दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव भी किया जा सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर पोषक तत्व प्रबंधन, पौधों की उचित संख्या बनाए रखना और नियमित निगरानी ही धान की बेहतर उपज का आधार है. ऐसे में किसानों को मौसम और फसल की स्थिति के अनुसार वैज्ञानिक सलाह का पालन करना चाहिए.