धार जिले के किसान सुमित भाटिया ने ‘परियोजना जल धारा’ के तहत ड्रिप सिंचाई, प्लास्टिक मल्चिंग और ट्रेलिसिंग तकनीक अपनाकर अपनी खेती की तस्वीर बदल दी. पारंपरिक मक्का-कपास की खेती से आगे बढ़ते हुए उन्होंने 1.5 एकड़ जमीन से होने वाली सालाना कृषि आय ₹72 हजार से बढ़ाकर ₹2 लाख से ₹2.5 लाख तक पहुंचाई.
बीना तहसील के ग्राम पुरेना के किसान अनमोल दुबे ने पारंपरिक खेती से हटकर रोजल हिबिस्कस की औषधीय खेती शुरू की.बिना रासायनिक खाद और दवाओं के जैविक एवं प्राकृतिक तरीके से तैयार फसल अब फ्लावरिंग स्टेज पर पहुंच चुकी है.कृषि विभाग ने खेत का निरीक्षण कर इसे किसानों के लिए प्रेरणादायक मॉडल बताया.
बालाघाट के सुरेंद्र जैतवार ने RAD योजना का लाभ लेकर खेती को विविधीकृत कृषि मॉडल में बदला. एक ही खेत में मछलीपालन, मुर्गीपालन, पशुपालन, फलोद्यान, हल्दी, सिंघाड़ा और जिमीकंद जैसी गतिविधियां संचालित हो रही हैं. खेत में 100 से अधिक फलदार और उपयोगी पौधे भी लगाए गए हैं.
बालाघाट के कारंजा में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत किसानों को धान में तना छेदक, माहू और शीथ ब्लाइट की पहचान व नियंत्रण की जानकारी दी गई. किसानों को जीवामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र के उपयोग के साथ जैविक एवं अनुशंसित रासायनिक उपाय बताए गए.
बालाघाट में धान की फसल को कीट-व्याधियों से बचाने के लिए कृषि विभाग ने खेतों का निरीक्षण तेज कर दिया है.ओरम्हा में रात्रिकालीन किसान संगोष्ठी आयोजित कर किसानों को कीट-रोग की पहचान और नियंत्रण के उपाय बताए गए। मोहगांव खुर्द, खारा, सिवनीकला और सारद में खेतों के निरीक्षण के दौरान माहू और लीफ ब्लाइट का प्रकोप पाया गया.
भोपाल के रतुआ रतनपुर गांव के किसान भाई हेमंत और ओम कुशवाह ने महज 10 हजार पौधों से नर्सरी की शुरुआत की थी. आज उनकी आधुनिक नर्सरी में हर महीने करीब 15 लाख फूल और सब्जियों के पौधे तैयार हो रहे हैं. महाराष्ट्र, यूपी, दिल्ली व राजस्थान तक पौधों की सप्लाई कर रहे हैं.
मध्य प्रदेश में मूंग और उड़द की फसल को जल्दी सुखाने के लिए पैराक्वाट के इस्तेमाल पर सवाल उठ रहे हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके अवशेष मिट्टी और पानी तक पहुंच सकते हैं.
सागर के खिमलासा गांव के किसान अमित जैन ने 7 एकड़ में ब्रोकली, रेड कैबेज, चाइना कैबेज और लेट्यूस जैसी विदेशी सब्जियों की खेती शुरू की.उनकी उपज सागर से लेकर भोपाल, इंदौर और दिल्ली तक सप्लाई होती है.आधुनिक तकनीक और सरकारी सब्सिडी की मदद से वह सालाना लाखों रुपये की आमदनी कमा रहे हैं.
जबलपुर का संस्थान खेतों में खरपतवार से फसल को होने वाले 25% नुकसान को रोकने के लिए जैविक नियंत्रण विधि पर शोध कर रहा है. यह तकनीक गाजर घास जैसी खतरनाक खरपतवारों पर भी कारगर है.
सोयाबीन की फलन और पॉड निर्माण अवस्था में चारकोल रॉट, गर्दन सड़न, पॉड ब्लाइट और राइजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट का खतरा बढ़ सकता है. कृषि वैज्ञानिकों ने रोगों की पहचान और फफूंदनाशक के उपयोग की अनुशंसा बताई है.
मूंग-उड़द की फसल में पीतशिरा रोग और फली छेदक कीट के प्रकोप से किसान परेशान हैं.पाटन के रोंझा गांव में कृषि अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने मौके पर पहुंचकर बीमारी की पहचान और फसल बचाने के उपाय बताए.धान और मक्का में कीट नियंत्रण की सलाह भी दी गई.
शाजापुर में सोयाबीन की फसल पर पीला मोजेक और कीट व्याधि को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने कई गांवों का दौरा किया. खेतों का निरीक्षण कर किसानों को रोगग्रस्त पौधों को हटाने, सफेद मक्खी-एफिड की रोकथाम और कीट नियंत्रण के लिए जरूरी सलाह दी गई.
लंदन की नौकरी छोड़कर भारत लौटे केमिकल इंजीनियर शुभम सिंह ने खेतों की पराली को अपना बिजनेस मॉडल बना लिया. मुरैना के क्रास्ट स्टार्टअप में पराली से पेपर, पैकेजिंग और ग्रीन बोर्ड तैयार किए जा रहे हैं. इससे किसानों को पराली से कमाई का मौका मिल रहा है.
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