खेती में केमिकल पेस्टिसाइड का कहर, आखिर इस बर्बादी की जिम्मेदारी किसकी?

खेती में केमिकल पेस्टिसाइड का कहर, आखिर इस बर्बादी की जिम्मेदारी किसकी?

खेतों में केमिकल के अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारी मिट्टी, पानी, वतावरण और थाली जहरीली हो रही है और ग्लोबल स्तर पर भी हमारे कृषि उत्पादों की साख गिर रही है. बार बार पीएम मोदी, कृषि मंत्री शिवराज सिंह सहित राज्य सरकारें बार-बार सुरक्षित खेती की अपील कर रही हैं, इसके बावजूद भी यह बर्बादी क्यों जारी है? आखिर मुनाफे के लिए इंसानी सेहत, वतावरण और देश की साख से खिलवाड़ रोकने में हमारा सिस्टम इतना नाकाम और मूकदर्शक क्यों बना है?

Advertisement
खेती में केमिकल पेस्टिसाइड का कहर, आखिर इस बर्बादी की जिम्मेदारी किसकी ?खेती में केमिकल पेस्टिसाइड का अंधाधुंध इस्तेमाल:

अपने देश में फसलों पर केमिकल कीटनाशकों के छिड़काव को लेकर एक अजीब सी होड़ मची हुई है. बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए बड़े सेलेब्रिटीज़ से विज्ञापन करवाती हैं और प्रचार में खूब पैसा खर्च करती हैं. कंपनियों का एकमात्र मकसद अपना ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है. किसानों को खतरनाक कीटों का खौफ दिखाकर अंधाधुंध केमिकल बिकवाए जा रहे हैं. इन केमिकल्स का असल मकसद फसल की हिफाजत करना था, लेकिन कंपनियों के भारी-भरकम टारगेट ने इसे सिर्फ एक बिजनेस बना दिया है.

किसानों को यह बताने वाला कोई नहीं है कि छिड़काव कब, कितना और कैसे करना चाहिए.कोई तय मानक या नियम नहीं होने के कारण खेतों में बेहिसाब जहर घोला जा रहा है, जिसका सीधा असर इंसान की सेहत, पशुओं के चारे और हमारे पूरे पर्यावरण पर पड़ रहा है.

खेतों में केमिकल, हर जगह जहर..

इस अंधाधुंध छिड़काव से खेती का नेचुरल इकोसिस्टम  खतरे में पड़ गया है. मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले केंचुए और लाभदायक जीवाणु खत्म हो रहे हैं. दुश्मन कीटों के अंडे और लार्वा का सफाया करने वाले मित्र कीट ड्रैगन फ्लाई, लेडीबर्ड बीटल—जो पहले आसानी से दिख जाते थे,आज लगभग खत्म होने की कगार पर हैं. फसलों फलो को फलने-फूलने और अनाज की पैदावार बढ़ाने में सबसे बड़ा रोल निभाने वाली मधुमक्खियों की जान हमेशा खतरे में रहती है, वह किसान खुद बिना किसी सुरक्षा कवच के दवा छिड़कते हैं, जिससे उनके शरीर के साथ-साथ आस-पड़ोस की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लगता है.

जरूरत इस बात की है कि जैसे मेडिकल स्टोर चलाने के लिए फार्मासिस्ट की डिग्री लाज़मी है, वैसे ही केमिकल्स कीटनाशक बेचने के लिए दुकानदार का एग्रीकल्चर ग्रेजुएट होना अनिवार्य किया जाए. केमिकल के ज्यादा अंश मिलने के कारण एक्सपोर्ट किए गए हमारे कृषि उत्पाद वापस आ रहे हैं, जिससे देश की साख बिगड़ रही है, इस पर रोक लगनी चाहिए।

किसानों को जागरूक कौन करे? 

प्रधानमंत्री मोदी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह किसानों के हर मंच पर केमिकल फ्री खेती करने करने की बात करते है अधिकतर राज्यों सरकारे येही मुहिम चलाई जा रही लेकिन ऐसे में कृषि विभाग के अफसर सिर्फ दवाओं का सैंपल लेकर खानापूर्ति कर लेते हैं,तो ऐसे में किसानों को कौन जागरूक करे? केमिकल कंपनियां भी डीलरों को सिर्फ बिक्री का टारगेट देकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं. किस कीड़े के लिए कौन सी दवा, कब और कैसे छिड़कनी है, यह बताने वाला कोई नहीं है.

यहां तक कि छिड़काव करते वक्त किसान अपनी हिफाजत कैसे करे, इसके लिए दवा के साथ कोई मास्क या सेफ्टी किट तक नहीं दिया जाता,जबकि यह बुनियादी जिम्मेदारी खुद कंपनियों की है.सच तो यह है कि गांव के स्तर पर किसानों को सही जानकारी और सुरक्षा मुहैया कराने वाला कोई सिस्टम ही मौजूद नहीं है, 

दवा है तो फायदे की जगह तबाही क्यों?

इस गंभीर मुद्दे पर डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय,पूसा,समस्तीपुर,बिहार के पौधा रोग एवं सूत्रकृमि विभाग विभागाध्यक्ष, डॉ एस के सिंह के सुझाव बेहद अहम हैं. वनस्पति संरक्षण निदेशालय के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में केमिकल कीटनाशकों की खपत 67,221 मीट्रिक टन रही. डॉ.सिंह बताते हैं कि बार-बार ज्यादा नाइट्रोजनयुक्त खाद देने से पौधे कोमल हो सकते हैं और मिट्टी की नेचर बिगड़ जाती है. फसलों के कीटनाशी के छिड़काव से हानिकारक कीट के साथ लाभकारी जीव भी मारे जाते हैं.

एक ही दवा का लगातार इस्तेमाल करने से कीटों में उस दवा के खिलाफ ताकत यानि रेजिस्टेंस पैदा हो जाती है.केमिकल्स पेस्टीसाइड का सबसे ज्यादा जोखिम उन किसानों और मजदूरों को है जो बिना दस्ताने, मास्क और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़ों के रसायनों का घोल बनाते हैं और खेतों में छिड़काव करते हैं.

सिस्टम की गलती या लापरवाही?

यह बात बेहद उत्साहजनक है कि अब भारत में खेती के तरीकों में बदलाव आ रहा हैऔर ऑर्गेनिक तथा नीम आधारित विकल्पों की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1994-95 में जहाँ सिर्फ 123 मीट्रिक टन जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल होता था, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 7,649 मीट्रिक टन हो गया है. ट्राइकोडर्मा, बैसिलस, स्यूडोमोनास, ब्यूवेरिया,मेटाराइजियम, नीम पर आधारित उत्पाद,जैसे मुफीद विकल्प कई परिस्थितियों में रसायनों पर हमारी निर्भरता को कम करने में मददगार साबित हो रहे हैं. इससे साफ जाहिर है कि किसान केमिकल नियंत्रण के साथ जैविक विकल्पों को अपना रहे हैं. लेकिन यह बहुत जरूरी है कि बाजार में मिलने वाले ये जैव उत्पाद उच्च गुणवत्ता वाले, पंजीकृत और अनुशंसित हों.

केमिकल पेस्टिसाइड से बचें 

डॉ. एस.के. सिंह के मुताबिक, भविष्य की सुरक्षित खेती का मुख्य आधार समेकित कीट प्रबंधन (IPM) और मिट्टी परीक्षण होना चाहिए। खेतों की नियमित निगरानी करें और बिना रोग की सही पहचान के कोई भी फफूंदनाशी या कीटनाशक न छिड़कें.भारत सरकार ने 2026 तक अनुमोदित कीटनाशकों की सूची जारी की है. इसलिए पुरानी सलाह या दुकानदार की जुबानी जानकारी के आधार पर दवा खरीदना मुनासिब नहीं है. छिड़काव करते समय हवा की दिशा, मधुमक्खियों की सक्रियता और पास के जलस्रोतों का खास खयाल रखें. फसल कटाई और छिड़काव के बीच तय प्रतीक्षा अवधि का सख्ती से पालन करना भी जरूरी है.

केमिकल पेस्टी साइड दवाए अपने आप में खलनायक नहीं हैं, बल्कि उनका गलत इस्तेमाल असली समस्या है. सेहतमंद खेती के लिए और किसानों के मुनाफा की खेती के लिए  खेती का हानिकारक कीटों मारने  केमिकल्स पेस्टीसाइड का अधिक प्रयोग' नहीं, बल्कि 'कम से कम जरूरी  केमिकल्स के साथ अधिकतम सुरक्षित केमिकल्स पेस्टीसाईड होना चाहिए.

POST A COMMENT