
खरीफ फसलों की कटाई के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि कम समय में कौन सी फसल लगाई जाए, जिससे अच्छी कमाई भी हो और रबी सीजन की मुख्य फसलों की बुवाई में भी देरी न हो. ऐसे में तोरिया की खेती किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है. उत्तर प्रदेश कृषि विभाग भी किसानों को तोरिया की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है.
तोरिया सरसों वर्ग की एक तिलहनी फसल है, जिसकी खेती कम समय, कम लागत और कम सिंचाई में की जा सकती है. यही वजह है कि इसे खरीफ और रबी सीजन के बीच की एक बेहतरीन फसल माना जाता है. कृषि विभाग के अनुसार, तोरिया की फसल करीब 90 दिनों में तैयार हो जाती है, जिससे किसान मुख्य रबी फसल बोने से पहले अतिरिक्त आमदनी हासिल कर सकते हैं.
तोरिया की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम अवधि है. यह फसल लगभग तीन महीने में तैयार हो जाती है. सितंबर के पहले सप्ताह में बुवाई करने पर किसान नवंबर तक इसकी कटाई कर सकते हैं. इसके बाद खेत में गेहूं, आलू, सरसों या अन्य रबी फसलों की बुवाई आसानी से की जा सकती है.
तोरिया को बोनस फसल के रूप में भी देखा जाता है. धान, मक्का या अन्य खरीफ फसलों के बाद किसान खाली पड़े खेतों में इसकी खेती कर सकते हैं. इससे मुख्य फसल के अलावा एक अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार होता है. कम समय में तैयार होने के कारण बाजार में इसकी बिक्री से किसानों को अतिरिक्त कमाई का अवसर मिलता है.
तोरिया की खेती में अन्य कई फसलों की तुलना में कम खर्च आता है. इसमें बीज, उर्वरक और सिंचाई की जरूरत अपेक्षाकृत कम होती है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कम निवेश के बावजूद इसकी अच्छी पैदावार किसानों को बेहतर लाभ दिला सकती है.
ऐसे क्षेत्रों में जहां पानी की कमी रहती है, वहां भी तोरिया की खेती की जा सकती है. इस फसल को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती. कम पानी में भी इसकी अच्छी बढ़वार और उत्पादन संभव है. यही कारण है कि जल संकट वाले इलाकों के किसानों के लिए भी यह लाभकारी विकल्प माना जाता है.
तोरिया के दानों में लगभग 41 से 43 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है. देश में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी खेती का महत्व बढ़ रहा है. तेल निकालने के अलावा इसके खली का उपयोग पशु आहार के रूप में भी किया जाता है.
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार तोरिया को फसल चक्र में शामिल करने से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है. इससे खेत की उत्पादकता में सुधार होता है और अगली फसलों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. किसान यदि फसल विविधीकरण अपनाते हैं तो तोरिया उनके लिए एक अच्छा विकल्प बन सकती है.