लगातार बारि‍श से धान फसल पर रोग और कीटों का खतरा, कृषि विज्ञान केंद्र ने जारी की एडवाइजरी

लगातार बारि‍श से धान फसल पर रोग और कीटों का खतरा, कृषि विज्ञान केंद्र ने जारी की एडवाइजरी

लगातार बारिश और खेतों में अधिक नमी से धान की फसल में शीथ ब्लाइट, जीवाणु झुलसा और तना छेदक का खतरा बढ़ गया है. चंदौली कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को फसल की निगरानी और समय पर बचाव के उपाय अपनाने की सलाह दी है.

paddy crop disease and pest threat advisorypaddy crop disease and pest threat advisory
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Sep 14, 2026,
  • Updated Sep 14, 2026, 2:34 PM IST

वर्तमान में कई इलाकों में लगातार बारिश, खेतों में ज्‍यादा नमी और यूरिया के असंतुलित इस्तेमाल से धान की फसल में रोग और कीटों का खतरा बढ़ गया है. किसानों की समस्याओं को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, चंदौली ने धान की फसल की सुरक्षा के लिए एडवाइजरी जारी की है. केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र रघुवंशी ने किसानों को खेतों का नियमित निरीक्षण करने और रोग के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की सलाह दी है.

शीथ ब्लाइट से बचाव के लिए संतुलित खाद और पानी जरूरी

कृषि विज्ञान केंद्र चंदौली के अनुसार, धान में शीथ ब्लाइट रोग का खतरा अधिक नमी और अनुकूल मौसम में बढ़ सकता है. यह रोग राइजोक्टोनिया सोलानी नामक फफूंद से होता है. इसकी शुरुआत आमतौर पर पानी की सतह के पास पौधे की निचली पत्ती की म्यान पर हरे-भूरे या कत्थई धब्बों से होती है.

संक्रमण बढ़ने पर धब्बे ऊपर की ओर फैलते हैं और पत्तियां सूखने लगती हैं. इससे दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. रोग से बचाव के लिए खेत में अनावश्यक पानी जमा न होने दें. यूरिया का इस्तेमाल संतुलित मात्रा में करें और खेत की मेड़ों तथा आसपास खरपतवार न बढ़ने दें. रोग के लक्षण दिखने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से उचित फफूंदनाशक का इस्तेमाल करें.

शीथ ब्लाइट के लिए इन दवाओं के इस्‍तेमाल की सलाह

कृषि विज्ञान केंद्र ने शीथ ब्लाइट के नियंत्रण के लिए निम्न फफूंदनाशकों के इस्तेमाल की जानकारी दी है.

हेक्साकोनाजोल 5 प्रतिशत ईसी: प्रति एकड़ 250 से 300 मिलीलीटर दवा को 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें.

प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी: एक मिलीलीटर दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें. केंद्र के अनुसार, प्रति एकड़ लगभग 200 मिलीलीटर दवा की मात्रा बताई गई है.

कार्बेन्डाजिम: एक ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल तैयार कर छिड़काव करें.

एजोक्सीस्ट्रोबिन: एक ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें.

जीवाणु झुलसा में सूखने लगती हैं पत्तियां

कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. अभयदीप गौतम ने धान में जीवाणु झुलसा रोग से बचाव की जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि अधिक नमी, लगातार बारिश, तेज हवा और खेत में लंबे समय तक पानी भरे रहने से इस रोग का खतरा बढ़ सकता है. रोग की शुरुआत में पत्तियां धूसर-हरे रंग की होकर मुड़ने लगती हैं. इसके बाद पत्तियों के किनारों पर पीले या भूसे जैसे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. धीरे-धीरे पूरी पत्ती सूख सकती है. गंभीर संक्रमण होने पर पौधों की बढ़वार, बालियों का विकास और दानों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है.

जल निकासी और संतुलित पोषण पर दें ध्यान

डॉ. गौतम ने किसानों को खेत में लगातार पानी जमा न रहने देने और अतिरिक्त पानी की निकासी की व्यवस्था करने की सलाह दी है. उन्होंने नत्रजन उर्वरक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करने और संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने पर जोर दिया है.

कृषि विज्ञान केंद्र की एडवाइजरी के अनुसार, जीवाणु झुलसा के नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और 15 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को अनुशंसित मात्रा के पानी में मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है. अधिक प्रकोप होने पर 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव करने की जानकारी दी गई है. रसायनों के इस्तेमाल से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ और उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करना जरूरी है.

तना छेदक कीट से बचाएं धान की फसल

धान में तना छेदक कीट पौधे के तने के अंदर पहुंचकर नुकसान करता है. इसके प्रकोप से पौधों की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित हो सकता है. कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ रितेश सिंह गंगवार ने किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने और शुरुआती अवस्था में ही कीट का नियंत्रण करने की सलाह दी है.

डेड हार्ट और सफेद बालियां हैं प्रमुख लक्षण

तना छेदक के शुरुआती प्रकोप में पौधे की बीच वाली कोंपल पीली होकर सूख जाती है. इसे डेड हार्ट कहा जाता है. ऐसी कोंपल को हल्के से खींचने पर वह आसानी से बाहर निकल सकती है. बालियां निकलने के समय प्रकोप होने पर बालियां सफेद दिखाई देती हैं और उनमें दाने नहीं बनते. इसे व्हाइट ईयर कहा जाता है. तने पर छोटे छेद और उनके आसपास कीट का मल या बुरादा भी दिखाई दे सकता है.

तना छेदक के नियंत्रण के लिए ये दवाएं करें इस्‍तेमाल

कृषि विज्ञान केंद्र ने तना छेदक के नियंत्रण के लिए निम्न विकल्प बताए हैं.

क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी: प्रति एकड़ 60 मिलीलीटर दवा को 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें.

कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 50 प्रतिशत एसपी: प्रति एकड़ 250 से 300 ग्राम दवा को 150 से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें.

क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 0.4 प्रतिशत जीआर: प्रति एकड़ 4 किलोग्राम दवा को 10 से 15 किलोग्राम सूखी रेत या बालू में मिलाकर खेत में समान रूप से बिखेरें.

कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 4 प्रतिशत जीआर: प्रति एकड़ 8 से 10 किलोग्राम की मात्रा का इस्तेमाल करने की जानकारी दी गई है.

छिड़काव के समय दवा का घोल पौधे के निचले हिस्से और तने तक पहुंचना चाहिए. दानेदार कीटनाशक का इस्तेमाल करते समय खेत की स्थिति और उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों का ध्यान रखें.

प्रमाणित बीज और विशेषज्ञ की सलाह अपनाएं

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों से स्वस्थ और प्रमाणित बीज इस्तेमाल करने की अपील की है. रोगग्रस्त खेत से बीज नहीं लेना चाहिए. बिना विशेषज्ञ की सलाह के अलग-अलग रसायनों को मिलाकर छिड़काव करने से बचें. किसी भी दवा का इस्तेमाल करते समय लेबल पर दी गई मात्रा, सुरक्षा सावधानियों और फसल के लिए स्वीकृत उपयोग का पालन करें. धान की फसल से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए किसान कृषि विज्ञान केंद्र, बिछिया कला, चंदौली में संपर्क कर सकते हैं. यह केंद्र आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या से संबद्ध है.

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