
मॉनसून में लंबे समय तक बारिश न होने से महाराष्ट्र के सोयाबीन किसान बहुत मुश्किल में हैं. कई किसान अब अपनी तैयार फसल की कटाई करने के बजाय उस पर ट्रैक्टर चला रहे हैं. खरीफ सीजन की शुरुआत तो अच्छी हुई थी, लेकिन बाद में लंबे समय तक बारिश न होने से सोयाबीन के खेतों में नमी की भारी कमी हो गई, जबकि उस समय फसल को लगातार बारिश की जरूरत थी. फसल के ठीक होने की उम्मीद कम होने पर, सोलापुर के कुछ हिस्सों में किसानों ने अपने खेतों में ट्रैक्टर चलाकर फसल को नष्ट करना शुरू कर दिया.
बारिश की कमी बढ़ने के साथ ही यह दुखद चलन अब मराठवाड़ा और विदर्भ इलाकों में भी फैल गया है. इन किसानों के लिए, ट्रैक्टर, जो आम तौर पर तरक्की की निशानी होता है, अब नुकसान का प्रतीक बन गया है.
अक्कलकोट तहसील के घोलसगांव गांव के सोयाबीन किसान पंडित बडोले ने 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से कहा, "पांच एकड़ में लगी सोयाबीन की फसल, जिसे हमने महीनों तक पाला-पोसा, उस पर ट्रैक्टर चलाना बहुत दर्दनाक है. फसल बर्बाद हो गई है और हम खाद और दूसरी चीजों पर खर्च किया गया पैसा भी वापस नहीं पा सकेंगे." उन्होंने कहा कि राज्य के सोयाबीन बेल्ट में ट्रैक्टर अब परेशानी का प्रतीक बनता जा रहा है, क्योंकि इसका इस्तेमाल अब फसल काटने के बजाय उसे नष्ट करने के लिए किया जा रहा है.
बडोले के इस मजबूरी भरे फैसले को अब पूरे महाराष्ट्र में सोयाबीन उगाने वाले किसान अपना रहे हैं, क्योंकि लंबे समय तक बारिश न होने से फसल बचाने या लागत वसूलने की उम्मीद खत्म हो गई है. जालना जिले की घनसावंगी तहसील के गुंज बुद्रुक गांव के एक किसान ने कहा, "हमने खेती के लिए महीनों मेहनत की है और उधार भी लिया है. अगर अब बारिश नहीं होती है, तो सूख रही फसल पर और पैसा खर्च करने का कोई मतलब नहीं है."
विदर्भ के अकोला के किसान और कृषि कार्यकर्ता लक्ष्मीकांत कौथकर ने बताया कि मिट्टी में नमी खत्म होने के बाद पौधों का विकास पूरी तरह से रुक गया था. उन्होंने कहा, "हमें फसल नष्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है."
जानकारों के मुताबिक, लंबे समय तक बारिश न होने का सोयाबीन की पैदावार पर सीधा असर पड़ा है. सोयाबीन वैज्ञानिक मिलिंद देशमुख ने बताया, "फूल आने और फलियां बनने के समय सोयाबीन को मिट्टी में पर्याप्त नमी की जरूरत होती है. अगर इन अहम चरणों के दौरान सूखा बना रहता है, तो कुछ खेतों में फसल हरी तो दिख सकती है, लेकिन उसकी पैदावार की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होगी."
यह चिंता उन किसानों के लिए ज्यादा है जो बारिश पर निर्भर हैं और जिनके पास फसल को बचाने के लिए सिंचाई की सुविधा बहुत कम या बिल्कुल नहीं है. “हम 21 जिलों में सोयाबीन की फसल की रुकी हुई बढ़त देख रहे हैं. इससे निश्चित रूप से कुल फसल और नतीजतन स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा. अगर अब बारिश भी होती है, तो उससे सिर्फ देर से बोई गई फसलों को ही फायदा होगा,” राज्य कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा.
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर सोयाबीन की फसल का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है, तो यह संकट खेतों से कहीं आगे तक फैल सकता है. एक कृषि अर्थशास्त्री ने कहा, “किसानों को न सिर्फ फसल की कीमत का नुकसान होगा, बल्कि बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और जमीन तैयार करने में किया गया उनका पूरा निवेश भी डूब जाएगा.”
महाराष्ट्र के मुख्य कृषि जिलों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सोयाबीन अहम भूमिका निभाता है. फसल खराब होने का मतलब है किसानों की कम आय और स्थानीय व्यापारियों और छोटे उद्योगों का कम कारोबार, जो खरीफ सीजन पर निर्भर हैं. जिन गांवों में किसानों ने खेती के लिए भारी कर्ज लिया है, वहां इसका असर गंभीर हो सकता है.
एक विशेषज्ञ ने चेतावनी दी, “एक बार जब फसल से होने वाली आय गिर जाती है, तो सबसे पहले कर्ज चुकाने की क्षमता पर असर पड़ता है. किसान खरीदारी टाल देंगे, खर्च कम कर देंगे और हो सकता है कि उन्हें अगली फसल के लिए फिर से कर्ज लेना पड़े. इससे आसानी से किसी एक इलाके में फसल का नुकसान एक बड़े ग्रामीण कर्ज संकट में बदल सकता है.”
धाराशिव के म्हात्रेवाड़ी के किसान बापू पवार ने हाल ही में कहा कि किसान सोयाबीन पर प्रति एकड़ लगभग 25,000 से 30,000 रुपये खर्च कर रहे हैं, और लंबे समय तक बारिश न होने के कारण खेती की लागत वसूलने की संभावना लगभग खत्म हो गई है.
इसके जवाब में, किसान संगठनों ने फसल के नुकसान का तुरंत आकलन (पंचनामा), फसल बीमा का भुगतान जल्द करने और सरकार से सीधे मुआवजे की मांग की है. उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया है कि अगर बारिश कम रहती है तो वे बड़े कृषि संकट के लिए तैयार रहें.
विशेषज्ञों ने जोर दिया कि सरकार को नुकसान का आकलन करने के लिए आधिकारिक फसल कटाई के मौसम का इंतजार नहीं करना चाहिए. नागपुर के किसान कार्यकर्ता विजय जवंधिया ने कहा, “प्रशासन को नुकसान के सबूत मिटने से पहले ही उसका रिकॉर्ड रखना होगा. बीमा और मुआवजे की व्यवस्था को तेजी से काम करना चाहिए.”