दूध देने वाले पशुओं खासतौर से भैंस के मुकाबले देश में गायों की संख्या ज्यादा है. दूध ही नहीं और भी कई वजहों से भारत में गाय को बहुत ही महत्व दिया जाता है. आज देश में गायों की 53 नस्ल हैं. कुछ खास नस्ल तो दूसरे देशों को नस्ल सुधार कार्यक्रम के लिए दी गई हैं. हर एक राज्य में कुछ ऐसी नस्ल भी हैं जो अभी तक रजिस्टर्ड नहीं हुई हैं. भारत दूध उत्पादन में नंबर वन है, जिसमे से 50 फीसद की हिस्सेदारी गायों की है. इसमे विदेशी नस्ल की गाय शामिल नहीं हैं. इसलिए ये जरूरी हो जाता है.
गायों को हर तरह की बीमारियों से बचाया जाए. हालांकि मेरठ, यूपी में कैटल रिसर्च सेंटर भी है. बावजूद इसके एक्सपर्ट की मानें तो गाय की रोजाना निगरानी कर हम उसे कई तरह की बीमारियां से बचा सकते हैं. साथ ही आर्टिफिशल इंसेमीनेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके भी गायों को बीमारियों से बचाया जा सकता है.
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सांस लेने में दिक्कत, गले में सूजन होती है. एंटीबायोटिक दवा और इंजेक्शन इलाज है. साथ ही बरसात के मौसम से पहले वैक्सीनेशन करा लेना चाहिए.
थनों में दिक्कत, दूध में छर्रे आना, थनों में सूजन इस बीमारी के लक्षण है. अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं. पशु के दूध और थन की समय-समय पर जांच जरूर करवाते रहें.
106-107 डिग्री तक बुखार आता है. पशु के पैरों में सूजन, पशु का लंगड़ा कर चलना भी लक्षण हैं. बरसात से पहले वैक्सीनेशन करवाना और बीमार पशुओं को हेल्दी पशुओं से दूर रखना चाहिए.
शरीर का तापमान कम हो जाना, सांस लेने में परेशानी होना. प्रसव के 15 दिन तक पूरा दूध न निकालें और जरूरत के मुताबिक पशु को कैल्शियम से भरा आहार और सप्लीमेंट दें.
मुंह और खुर में दाने होते हैं, दाने छाला बनकर फट जाते हैं और घाव गहरा हो जाता है. फौरन ही डॉक्टर को दिखाना चाहिए. बरसात से पहले टीकाकरण करा लेना चाहिए. बारिश में पशु को खुले में चरने नहीं देना चाहिए.
पेशाब और गोबर में खून आना, तेज बुखार होना. पशु चिकित्सक से संपर्क कर स्थिति के हिसाब से उपचार करना चाहिए. इस रोग से बचाने के लिए वक्त रहते टीकाकरण जरूरत करा लेना चाहिए.
पशु सुस्त हो जाता है, सूखी खांसी और नाक से खून आने लगता है. रोग के लक्षण दिखते ही पशु को अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए. पशु के आहार का खास ध्यान रखना चाहिए.
पांच-छह महीने में योनिमुख से तरल गिरता है, बच्चे होने के लक्षण दिखते हैं, लेकिन गर्भपात हो जाता है. पशु की ठीक से सफाई करनी चाहिए, डीवॉर्मिंग करनी चाहिए और पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. छह से आठ महीने के पशु को ब्रुसेला का टीका लगवाना चाहिए.
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पशु का बायां पेट फूल जाता है, पेट को थपथपाने पर ढोलक बजने की जैसी आवाज आती है.