Seafood Export and Fisheries भारत की प्राथमिकता मजबूत मछली पालन और एकवाकल्चर वैल्यू चेन का निर्माण करना है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है. साथ ही एकवाकल्चर उत्पादन में भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है. देश में 2013-14 से राष्ट्रीय मछली उत्पादन में 103 फीसद की बढ़ोतरी हुई है, जो 2024-25 में रिकॉर्ड 195 लाख टन तक पहुंच गई है. सीफूड एक्सपोर्ट भी दोगुना होकर 60523 करोड़ रुपये का हो गया है. जिसके चलते मछली पालन और एकवाकल्चर क्षेत्र आठ फीसद से ज्यादा की लगातार सालाना औसत वृद्धि दर के साथ देश के आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है. यह पिछले 10 साल में बुनियादी ढांचे के विकास, प्रौद्योगिकी और स्थायी प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए 1.38 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश से मुमकिन हुआ है.
डॉ. अभिलक्ष लिखी, सचिव, मत्स्य पालन विभाग, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार का कहना है इस रफ्तार को ऐसे ही आगे बढ़ाने के लिए संपूर्ण मछली पालन और एकवाकल्चर मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करना बहुत जरूरी है. देश के इनलैंड और मरीन इकोलॉजिक सिस्टम में लगभग तीन करोड़ मछुआरे और मछली पालक इन वैल्यू चेन से जुड़े हैं.
डॉ. अभिलक्ष लिखी ने बताया कि एक्सपर्ट का यह मानना है कि सबसे बढि़या एक्वाकल्चर प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए वैल्यू चेन को क्षेत्रीय रूप से बंटी मछली प्रजातियों में विविधतापूर्ण बनाया जाना चाहिए. इसका मकसद खाद्य सुरक्षा और नए वैश्विक बाज़ारों में समुद्री खाद्य निर्यात को बढ़ावा देना है. हाल ही में ब्रिटेन के साथ हुआ व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (सीईटीए) इसका एक उदाहरण है. इससे मछली पालन क्षेत्र, विशेष रूप से तटीय राज्यों को फायदा होगा, क्योंकि यह ब्रिटेन के 5.4 अरब डॉलर के समुद्री आयात बाजार तक बेहतर पहुंच प्रदान करता है. इस मामले में भारत सरकार ने सभी वैल्यू चेन के समाधानों के लिए देशभर में 34 मछली पालन और एक्वाकल्चर उत्पादन और प्रोसेसिंग क्लस्टर निर्धारित किए हैं.
हर एक क्लस्टर टूना, झींगा, पर्ल स्पॉट, म्यूरल, पंगेसियस, तिलापिया, ट्राउट, सजावटी मछली, मोती और समुद्री शैवाल जैसी प्रजातियों पर केंद्रित है. पहचानी गई प्रजातियों के लिए वैल्यू चेन के उत्पादन-पूर्व उत्पादन और कटाई-के बाद ब्लॉक का व्यवाहरिक फर्क का अध्ययन वर्तमान में चल रहा है. मूल्य प्राप्ति में सुधार, आय में बढ़ोतरी और वैल्य एडिड निर्यात को सक्षम बनाने के लिए नाबार्ड और निजी कारोबारी द्वारा लक्षित निवेश के माध्यम से बुनियादी ढांचे की कमियों को दूर किया जाएगा. इसी तरह इन क्लस्टरों में पहचानी गई प्रजातियों का पता लगाने की क्षमता को पहली वरीयता दी जाएगी. ब्रूड स्रोत, हैचरी संचालन, बढ़ती तकनीक, कटाई, प्रसंस्करण और मार्केटिंग जैसे चरणों के माध्यम से एक्वा प्रोडक्ट की पारदर्शिता को जरूरी तकनीकों का समर्थन दिया जाएगा.
डॉ. अभिलक्ष लिखी के मुताबिक कुशल वैल्यू चेन निर्माण के मकसद से किसी भी क्लस्टर विकास कार्यक्रम को मजबूत अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) और विस्तार सेवाओं द्वारा समर्थित होना बहुत जरूरी है. संबंधित क्लस्टर की भौगोलिक निकटता के आधार पर, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा संचालित 700 से अधिक कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के मौजूदा नेटवर्क को तैनात किया जाएगा. व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण इनलैंड और मरीन मछली प्रजातियों के प्रजनन और बीज उत्पादन में 'प्रैक्टिस पैकेज और क्षेत्रीय प्रदर्शन' पर सूचना का पारस्परिक प्रसार प्राथमिकता पर होगा.
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