
बाजार में बकरी के दूध की डिमांड बढ़ रही है. कुछ खास मौकों पर तो दूध की इतनी डिमांड होती है कि 300 से 400 रुपये लीटर तक बिक जाता है. वहीं मीट के लिए भी बड़ी संख्या में बकरे-बकरियां पाले जा रहे हैं. और दोनों के लिए ही ये जरूरी है कि बकरियां ऐसी हों जो भरपूर दूध दें तो हर साल बिना किसी रुकावट के दो बार बच्चे भी दें. क्योंकि बकरी जब तक बच्चा नहीं देगी तो दूध उत्पादन नहीं होगा. वहीं बच्चे होंगे तो मीट के लिए बकरे-बकरियों की संख्या बढ़ेगी. इसीलिए अब बकरियों की उन खास नस्ल पर ज्यादा बात हो रही है जो ज्यादा दूध और ज्यादा बच्चे देती है.
गोट एक्सपर्ट की मानें तो इसके चलते ही बकरियों की दो खास नस्ल जमनापारी और जखराना की इसके लिए डिमांड बढ़ रही है. यूपी की दो खास नस्ल जखराना और जमनापरी को खासतौर पर उत्तर भारत के किसी भी राज्य में पाला जा सकता है. जमनापारी जहां ज्यादा दूध के लिए जानी जाती है तो जखराना ज्यादा बच्चे देने के लिए. इसके साथ ही इनकी और भी खूबियां हैं.
केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी), मथुरा के सीनियर साइंटिस्ट और जमनापारी नस्ल के एक्सपर्ट डॉ. एमके सिंह ने किसान तक को बताया कि दूसरे देश भारत से जमनापारी नस्ल के बकरों की डिमांड अपने यहां कि बकरियों की नस्ल सुधार के लिए करते हैं. क्योंकि जमनापारी नस्ल की बकरी रोजाना चार से पांच लीटर तक दूध देती है. इसका दुग्ध काल 175 से 200 दिन का होता है. एक दुग्ध काल में 500 लीटर तक दूध देती है. इस नस्ल में दो बच्चे देने का रेट 50 फीसद तक है. इस नस्ल का वजन रोजाना 120 से 125 ग्राम तक बढ़ता है. शारीरिक बनावट और सफेद रंग का होने के चलते इनकी खूबसूरती देखते ही बनती है. इसीलिए ईद पर भी इनकी खासी डिमांड रहती है.
सीआईआरजी के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. गोपाल दास का कहना है कि बकरी की पहचान उसके दूध, मीट और बच्चे देने की क्षमता से आंकी जाती है. जखराना एक ऐसी नस्ल है जिसके बकरे और बकरी 25 से 30 किलो वजन तक पर आ जाते हैं. इसके अलावा इस नस्ल की बकरी रोजाना एक से डेढ़ लीटर तक दूध देती है. सीआईआरजी खुद जखराना के दूध को रिकॉर्ड कर चुका है.
एक बकरी ने 90 दिन में 172 लीटर दूध दिया था. यह नस्ल एक यील्ड में पांच महीने तक दूध देती है. अब रहा सवाल बच्चे देने की क्षमता के बारे में तो 60 फीसद जखराना बकरी दो या तीन बच्चे तक देती हैं. किसी और दूसरी नस्ल की बकरी में यह तीनों खूबी एक साथ नहीं मिलेंगी.
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