
वैसे तो हर कारोबार में जोखिम होता है. खासतौर पर सबसे ज्यादा जोखिम बाजार का होता है. लेकिन पोल्ट्री सेक्टर ऐसा कारोबार है जहां सबसे ज्यादा जोखिम पोल्ट्री फार्म में ही होता है. पोल्ट्री एक्सपर्ट की मानें तो ये सेक्टर सबसे ज्यादा जोखिम वाला है. हालात ऐसे हैं कि एक हवा का झोखा भी मुर्गियों की जान लेता हुआ निकल जाता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि इस सेक्टर में मुनाफा नहीं है. लेकिन अंडे-चिकन का कारोबार जितना मुनाफे वाला है तो उतना ही उसमे जोखिम भी है. पोल्ट्री फार्मर की जरा सी लापरवाही और मुर्गे-मुर्गियों पर बीमारियों का अटैक मुनाफा तो कम करता ही है, लेकिन कई बार लागत से भी हाथ धोना पड़ता है.
पोल्ट्री एक्सपर्ट की मानें तो पोल्ट्री कारोबार में सबसे ज्यादा लागत मुर्गियों के फीड और उन्हें बीमारियों से बचाने पर आती है. क्लाइमेट चेंज के चलते आए दिन अलग-अलग तरह की बीमारियां पोल्ट्री फार्म पर अटैक करने लगी हैं. इन्हीं सब वजहों के चलते अंडे-चिकन की लागत बढ़ रही है. पोल्ट्री कारोबार करना मुश्किल हो गया है. हालांकि किसानों को ऐसी ही परेशानियों से बचाने के लिए देश की कई बड़ी पोल्ट्री एसोसिएशन पोल्ट्री फार्मर को जागरुक करने के लिए सेमिनार का आयोजन करती रहती हैं.
पोल्ट्री एक्सपर्ट के मुताबिक फीड पोल्ट्री का अहम हिस्सा है. सबसे ज्यादा खर्च भी फीड पर ही होता है. अंडे देने वाली मुर्गी का फार्म हो या चिकन के लिए पाले जाने वाले मुर्गों का फार्म, अगर दोनों ही जगह डीडीजीएस का इस्तेमाल किया जाए तो फीड की लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है. वहीं एक दूसरा तरीका ये भी है कि जब बाजार में मक्का और सोयाबीन का दाम ज्यादा हो तो चावल भी मुर्गियों को खिलाए जा सकते हैं.
लेकिन चावल खिलाने के दौरान काफी ऐहतियात बरतने की जरूरत है. कब, किस तरह का चावल और कैसे खिलाना है इसकी जानकारी होना भी जरूरी है. अगर खुद को जानकारी ना हो तो किसी एक्सपर्ट से राय ले लें. लेकिन इन दोनों ही तरीकों से फीड लागत को बहुत कम किया जा सकता है. वहीं फीड से भी बीमारी फैलने का खतरा बना रहता है. इसलिए फीड खरीदते वक्त किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ये भी बताया.
पोल्ट्री एक्सपर्ट और डॉ. अनूप कालरा का कहना है कि एंटी माइक्रोबियल रेसिस्टेंट (एएमआर) को लेकर वर्ल्ड लेवल पर चर्चा हो रही है. इसका सीधा असर पोल्ट्री प्रोडक्ट अंडे और चिकन के दाम समेत डिमांड पर भी पड़ रहा है. एक्सपोर्ट के दौरान भी खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है. और ये सब होता है एंटी बायोटिक्स के इस्तेमाल करने से. होता ये है कि पोल्ट्री फार्म में बीमारी होने पर किसान एंटी बायोटिक का इस्तेमाल पहले करते हैं.
जबकि होना ये चाहिए कि एंटी बायोटिक्स का इस्तेमाल बहुत सोच-समझ कर किया जाए, ये लागत को भी बढ़ाता है. एंटी बायोटिक्स का इस्तेमाल और लागम कम करने का रास्ता आयुर्वेदिक दवाई हैं. आज ज्यादातर बीमारियों का इलाज आयुर्वेदिक में है. अगर कहीं जरूरत भी पड़े तो बहुत कम और एक्सपर्ट की सलाह पर ही एंटी बायोटिक्स का इस्तेमाल करें.
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