
भारत में पूरे साल मछली पालन किया जाता है. मछली पालन का कोई सीजन नहीं है. ये बात अलग है कि देश के कुछ खास हिस्सों जैसे नॉर्थ इंडिया में मौसम के हिसाब से कम या ज्यादा मछली खाई जाती है. वर्ना तो मछली पालन लद्दाख, जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ इंडिया तक होता है. ठंडे-गर्म और मीठे-खारे दोनों ही तरह के पानी में मछलियां पाली जाती हैं. फिशरीज एक्सपर्ट की मानें तो मछली पालन में सबसे ज्यादा और बड़ा जोखिम मछलियों की बीमारियों को लेकर है. मौसम ठंड का हो या गर्मी-बरसात का, हर मौसम में एक्सपर्ट मछलियों की बीमारियों को लेकर अलर्ट रहने की सलाह देते हैं.
अगर गर्मियों की बात करें तो 35 डिग्री से ऊपर के तापमान पर मछलियां परेशान हो जाती हैं और बीमार पड़ने लगती हैं. कई बार तो मौत भी हो जाती है. खासतौर से मई-जून के दौरान खास देखभाल की हिदायत दी जाती है. इसी को देखते हुए गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (गडवासु) के मत्स्य कॉलेज के फिशरीज एक्सपर्ट का कहना है कि अगर मछली पालक फीड और तालाब के पानी के उपचार से जुड़े कुछ टिप्स अपनाते हैं तो मछलियां हेल्दी रहती हैं.
गडवासु मत्स्य कॉलेज की डीन डॉ. मीरा का कहना है कि तालाब में लगातार प्राकृतिक भोजन(प्लवक/plankton) का उत्पादन कर मछलियों को देना भी मछलियों और तालाब के पानी को उपचारित करने जैसा ही है. तालाब में लगातार प्लवक उत्पादन हो इसके लिए खाद को चरणबद्ध तरीके से और तय मात्राओं के मुताबिक डालना होगा. चारे की बर्बादी को कम करने और चारे के बेहतर रिजल्ट लेने के लिए खेत पर बने पेलेट चारे का इस्तेमाल करें.
अगर पानी का रंग गहरा हरा, भूरा, हरा-भूरा हो जाए या पानी की सतह पर शैवाल (algal blooms) दिखाई देने लगें तो स्थिति सामान्य होने तक तालाब में खाद और चारा देना बंद कर दें. साथ ही, पानी के pH मान में दिन-रात होने वाले बदलाव की भी जांच करें. यह दिन के चरम घंटों में 9.5 से ऊपर जा सकता है और रात के घंटों में 7.0 से नीचे गिर सकता है. वहीं एक्सपर्ट की सलाह के मुताबिक चूना या फिटकरी और जिप्सम का इस्तेमाल करके pH की अधिकतम सीमा (7.5-8.5) बनाई रखी जा सकती है.
डॉ. मीरा का कहना है कि मछली पालक किसानों को ज्यादा उत्पादकता हासिल करने के लिए तालाबों में ज्यादा मछलियां डालने (overstocking), ज्यादा फीड देने और ज्यादा खाद डालने से बचना चाहिए. इससे मछली पालन की लागत बढ़ जाती है और पानी की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है. इसके साथ ही तापमान और pH बढ़ने के साथ अमोनिया की विषाक्तता भी बढ़ जाती है, जिससे मछलियों में तनाव पैदा होता है और बाद में बीमारी फैलने या उनकी मौत होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसी स्थितियों में, तालाबों में हवा का संचार (aeration) ठीक से बनाए रखें. इसके लिए साधारण नमक डाल सकते हैं और एक्सपर्ट की सलाह के मुताबिक जिप्सम या फिटकरी का इस्तेमाल कर सकते हैं.
ये भी पढ़ें-
पशुपालकों और पर्यावरण तक के लिए ऐसे फायदेमंद है वाइट रेवोलुशन-2
Fish Care: गर्मियों में भी खूब होगा मछली उत्पादन, गडवासु के फिशरीज एक्सपर्ट ने दिए टिप्स