
आने वाली मई में बकरीद का त्यौहार मनाया जाएगा. इस मौके पर भेड़-भैंस और बकरों की कुर्बानी दी जाती है. खासतौर पर कुर्बानी के लिए बकरों की खरीद-फरोख्त काफी पहले से ही शुरू हो जाती है. इसी के चलते बाजार और हाट में बकरों का आना शुरू हो गया है. एक या दो बकरों की कुर्बानी देने वाले मुस्लिमों ने बकरों की खरीद शुरू कर दी है. इस मौके पर तीन दिन तक कुर्बानी दी जाएगी. भारत में ज्यादातर बकरों की कुर्बानी दी जाती है. जम्मू-कश्मीर और दक्षिण भारत में बड़ी संख्या में भेड़ की कुर्बानी भी होती है.
लेकिन अक्सर देखा गया है कि जैसे ही लोग बकरा खरीदकर घर पहुंचते हैं तो बकरा बीमार हो जाता है. सुस्त रहने लगता है. बकरा खाना पीना कम या कभी कभी तो एकदम बंद कर देता है. कई बार तो बकरे की मौत तक हो जाती है. जबकि बाजार में बिकने वाले मीट के मुकाबले कुर्बानी का बकरा महंगा होता है. बकरे की खूबसूरती और उसकी तंदरुस्ती को देखते हुए उसके रेट लगाए जाते हैं.
गोट एक्सपर्ट का कहना है कि बकरों को बाजार में लाने से पहले कारोबारी उन्हें खूब खिलापिलाकर लाते हैं. बहुत सारे कारोबारी बकरे को तगड़ा दिखाने के चक्कर में बेसन का घोल समेत कुछ खास तरह के केमिकल पिलाकर लाते हैं. बेसन पेट को फुला देता है. लेकिन गर्मियों में बेसन पीने से बकरे का पेट भी खराब हो जाता है. अब जैसे ही बकरा घर आता है तो घर के बच्चे खुशी खुशी में उसे खूब खिलाने पिलाने लगते है. इस तरह ओवर डाइट के चक्कर में बकरा बीमार पड़ जाता है. कई बार तो बकरे की मौत तक हो जाती है.
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