
खासतौर पर अंडे-चिकन के बारे में सोशल मीडिया पर बहुत सारी ऐसी पोस्ट शेयर होती हैं जिनका हकीकत से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता है. बावजूद इसके हर दिन सोशल मीडिया पर अंडे और चिकन के बारे में कोई ना कोई अफवाह फैलाई जाती है. कभी कहा जाता है कि जो अंडा बाजार में 7 रुपये का बिक रहा है उसमे चूजा (मुर्गी का बच्चा) होता है. कभी कहा जाता है कि प्लास्टितक के अंडे बाजार में बिक रहे हैं. इतना ही नहीं मुर्गे को इंजेक्शन देकर जल्दी बड़ा करने की अफवाह तक सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होती है.
लेकिन पोल्ट्री एक्सपर्ट ऐसे किसी भी दावे को सिरे से खारिज करते हैं. इसी के संबंध में देश की राजधानी दिल्ली में वेट्स इन पोल्ट्री (वीआईवी) की ओर से एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की गई थी. जहां मीडिया के सामने पोल्ट्री एक्सपर्ट ने अंडे-चिकन से जुड़ी हर उस अफवाह के बारे में बात की जो लोगों को अंडा-चिकन खाने से दूर करती है. अंडे-चिकन से जुड़ी 10-20 नहीं पूरे 235 से ज्यादा अफवाहों के बारे में फैक्ट सामने रखे गए.
वीआईवी प्रेसिडेंट डॉ. अजय देशपांडे ने किसान तक से बात करते हुए कहा कि अंडा नॉनवेज है, ये एक सबसे बड़ी अफवाह खासतौर से फेसबुक और दूसरे प्लेटफार्म पर फैलाई जाती है. जबकि 100 फीसद हकीकत ये है कि अंडा हर तरह से एक वेज खानपान है. इस बात को हम साइंटीफिक टेस्ट करा कर भी साबित कर सकते हैं. अंडा वेज है इसका एक सुबूत हम ऐसे भी दे सकते हैं कि अंडे देने वाली मुर्गी पोल्ट्री फार्म के जिस केज में रहती हैं वहां कोई मुर्गा नहीं होता है.
मुर्गे से बिना मिले ही मुर्गी हर रोज सुबह अंडा देती है. अंडा देने के लिए मुर्गी को दिनभर में तीन से चार बार सिर्फ फीड खिलाना होता है. और हम पूरे दावे के साथ कह सकते हैं कि बाजार में 7 से 8 रुपये के बिकने वाले अंडे से चूजा नहीं निकलता है. अंडे का ज्यादा उत्पादन लेने और चिकन के लिए लिए मुर्गे की जल्दी ग्रोथ के बारे में भी एक अफवाह ये फैलाई जाती है कि प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए दवाई का इस्तेमाल किया जाता है.
जबकि हकीकत ये है कि मुर्गी 24 घंटे में एक अंडा देती है. ये साइंस से प्रूफ है. अब कोई किसी दवाई की मदद से दो अंडे कैसे ले सकता है. ऐसा कोई इंजेक्शन नहीं है जिसे देकर मुर्गी से दो अंडे लिए जा सकें. बाजार में प्लास्टिलक के अंडे बिकने की बात भी झूठी है. इसी तरह चिकन के लिए मुर्गों में एंटी बॉयोटिक्स दवाई का इस्तेमाल करने की अफवाह उड़ाई जाती है. जबकि एंटी बॉयोटिक्स कोई भी हो वो बहुत महंगी होती है.
अगर बिना किसी बीमारी के एंटी बॉयोटिक्स खिलाएंगे तो चिकन की लागत बढ़ जाएगी. बीमारी न होने पर एंटी बॉयोटिक्स का मुर्गे पर बुरा असर भी होगा. जब चिकन का कारोबार मुश्किल से छह-सात रुपये किलो पर होता है तो ऐसे में पोल्ट्री फार्मर क्यों अपने मुर्गों को एंटी बॉयोटिक्सि खिलाएगा.
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