सोयाबीन-कपास सूखी, धान भी बेहालमहाराष्ट्र के विदर्भ में बारिश की कमी किसानों के लिए बड़ी परेशानी बनती जा रही है. लंबे समय से बारिश नहीं होने के कारण खेतों में खड़ी खरीफ फसलों पर असर पड़ रहा है. सबसे ज्यादा चिंता सोयाबीन, कपास और अरहर की फसल को लेकर है. पश्चिमी विदर्भ में सूखे की स्थिति और गंभीर बताई जा रही है. वहीं, बारिश की कमी का असर अब गांवों के जलस्रोतों पर भी दिखाई देने लगा है. महाराष्ट्र में इस साल बारिश की कमी से खेती और पानी दोनों पर दबाव बढ़ा है.
अमरावती डिविजन के अकोला जिले में बारिश की कमी का असर खेतों में साफ दिखाई दे रहा है. कई जगह सोयाबीन की फसल सूखने लगी है. किसानों का कहना है कि लंबे समय से अच्छी बारिश नहीं हुई है. ऐसे में पौधों पर फलियां तो आ गई हैं, लेकिन उनमें दाने का विकास ठीक से नहीं हो पा रहा है. पश्चिमी विदर्भ में लंबे सूखे दौर की वजह से सोयाबीन की फसल को खास नुकसान पहुंचने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं.
कृषि विभाग के अनुसार अमरावती डिविजन में खरीफ फसलों की बड़े क्षेत्र में बुवाई हुई है. इसमें सोयाबीन, कपास और अरहर प्रमुख फसलें हैं. विभाग के मुताबिक बारिश की कमी से सोयाबीन में करीब 50 से 60 प्रतिशत, जबकि कपास और अरहर में करीब 40 से 50 प्रतिशत नुकसान की संभावना बताई गई है. लंबे समय तक बारिश नहीं होने से फसल की बढ़वार, फलियां और दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है.
अकोला के सीसा मास गांव में किसानों की परेशानी खेतों में साफ दिखाई दे रही है. एक किसान ने करीब 8 एकड़ जमीन में सोयाबीन की बुवाई की थी. खेती के लिए उन्होंने करीब 50 से 60 हजार रुपये का कर्ज भी लिया था. लेकिन बारिश नहीं होने के कारण फसल सूख गई. अब किसान के सामने फसल बचाने के साथ-साथ कर्ज चुकाने की भी चिंता खड़ी हो गई है.
अकोला के ग्रामीण इलाकों में सिर्फ सोयाबीन ही नहीं, बल्कि कपास की फसल भी बारिश का इंतजार कर रही है. किसानों ने बताया कि कपास के पौधों पर फल आने शुरू हुए थे, लेकिन पर्याप्त नमी नहीं मिलने से पौधों की बढ़वार प्रभावित हो रही है. हरे पत्ते सूखने लगे हैं और किसानों को इस बात की चिंता है कि अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है. महाराष्ट्र में बारिश की कमी के कारण कपास और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों पर दबाव की स्थिति पहले भी दर्ज की गई है.
विदर्भ के दूसरे हिस्से में भी खेती की स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है. नागपुर डिविजन के भंडारा और गोंदिया जिले धान की खेती के लिए जाने जाते हैं. यहां कुल बारिश की स्थिति कुछ जगह ठीक रही है, लेकिन धान की फसल को जिस समय और जितनी बारिश की जरूरत थी, उस समय पर्याप्त पानी नहीं मिला. कृषि विभाग के मुताबिक इससे धान की फसल में करीब 30 से 40 प्रतिशत नुकसान की जानकारी सामने आई है.
यानी विदर्भ के पश्चिमी हिस्से में सोयाबीन, कपास और अरहर बारिश की कमी से परेशान हैं, जबकि पूर्वी हिस्से में धान की फसल पर बारिश की कमी का असर देखने को मिल रहा है.
बारिश नहीं होने का असर अब सिर्फ किसानों के खेतों तक सीमित नहीं है. अकोला के कई ग्रामीण इलाकों में जलस्रोतों पर भी दबाव बढ़ रहा है. काटेपूर्णा जैसे जलाशयों और दूसरे स्थानीय जलस्रोतों में पानी की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ी है. राज्य के कई हिस्सों में बारिश की कमी और कम जल भंडारण के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की समस्या सामने आई है.
डोंगरगांव और आसपास के ग्रामीण इलाकों में लोगों ने पानी जमा करके रखना शुरू कर दिया है. स्थानीय लोगों के मुताबिक कई जगह नल से पानी 8 से 10 दिन के अंतराल पर पहुंच रहा है. इसलिए जिस दिन पानी आता है, उस दिन लोग प्लास्टिक के ड्रम, बैरल और टैंकों में पानी भरकर रख लेते हैं. ग्रामीणों को चिंता है कि अगर बारिश का इंतजार और लंबा हुआ तो आने वाले दिनों में पानी की समस्या और बढ़ सकती है.
विदर्भ में बारिश की कमी को लेकर सरकार और प्रशासन भी स्थिति पर नजर रख रहे हैं. महाराष्ट्र सरकार ने हाल में सूखे जैसी स्थिति से प्रभावित किसानों के लिए राहत की प्रक्रिया शुरू करने और फसल नुकसान का आकलन करने की बात कही है. सरकार ने यह भी कहा है कि पीने के पानी और पशुओं के चारे की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
अकोला और विदर्भ के ग्रामीण इलाकों की मौजूदा तस्वीर किसानों की दोहरी परेशानी दिखाती है. एक तरफ बारिश की कमी से खेतों में सोयाबीन और कपास जैसी फसलें सूख रही हैं. दूसरी तरफ जलस्रोतों पर दबाव बढ़ने से पीने के पानी की चिंता भी सामने आ रही है. ऐसे में किसानों की नजर अब बारिश पर टिकी है. अगर पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो फसल उत्पादन के साथ ग्रामीण इलाकों में पानी की समस्या भी गंभीर हो सकती है.
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