कानपुर देहात के अकबरपुर ब्लॉक की रहने वाली श्वेता बनीं पशु सखी उत्तर प्रदेश में पशुपालन किसानों की अतिरिक्त आय का जरिया रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों से ये कमाई का अच्छा-खासा सोर्स बन कर उभरा है. आज हम कानपुर देहात की एक महिला की सफल कहानी बताने जा रहे है, जो गांव-गांव में घूमकर बकरियों का इलाज के जरिए रोल मॉडल बनकर उभरी है. कानपुर देहात के अकबरपुर ब्लॉक की रहने वाली श्वेता अब गांव में पशुपालकों की भरोसेमंद साथी बन चुकी हैं. वो अब घर-परिवार और खेत की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने परिवार को आर्थिक सहारा भी दे रही है.
32 वर्षीय श्वेता ने बताया कि आजीविका मिशन से जुड़कर पशु सखी बनीं थी. उसने पिछले करीब एक वर्ष में 120 घरों की 300 से अधिक बकरियों तक स्वास्थ्य सेवाएं दी हैं. हालिया कृमिनाशन अभियान में भी उन्होंने करीब 350 से 360 बकरियों तक दवा पहुंचाई। जिससे उन्हें गांव में नई पहचान और सम्मान मिला तो साल भर में करीब 30 हजार रुपये की आय ने परिवार को आर्थिक सहारा भी दिया.
उन्होंने बताया कि पति, दो बच्चों और सास-ससुर के साथ रहकर पहले घर और खेत से जुड़े कामों को संभालती थीं, बता दें कि श्वेता के पति तहसील में नौकरी कर रहे हैं, लेकिन परिवार के बढ़ते खर्च के बीच श्वेता भी आर्थिक जिम्मेदारियों में हाथ बंटाना चाहती थीं. इसी दौरान ग्राम पंचायत की समूह सखी से उन्हें पशु सखी कार्यक्रम की जानकारी मिली. वहीं, चयन के बाद आजीविका मिशन से मिले तीन दिन के प्रशिक्षण ने उनके लिए आगे बढ़ने का रास्ता खोल दिया. प्रशिक्षण पूरा कर उन्होंने पशु सखी के रूप में काम शुरू किया और बकरी पालने वाले परिवारों तक पहुंचने लगीं.
श्वेता का काम केवल पशुपालकों तक दवा पहुंचाने तक सीमित नहीं है. वह उन्हें बकरियों में होने वाली बीमारियों, समय पर टीकाकरण और बेहतर देखभाल के बारे में भी जागरूक करती हैं. लगातार गांव-गांव पहुंचने और पशुपालकों से जुड़ने का असर यह हुआ कि एक साल में उनकी सेवाओं का दायरा 120 परिवारों तक पहुंच गया.
अब तक 300 से अधिक बकरियों तक उनकी सेवाओं का लाभ पहुंचा है. वहीं, कृमिनाशन अभियान में श्वेता ने करीब 350 से 360 बकरियों तक दवा पहुंचाई. इससे क्षेत्र में पशुओं की सेहत और समय पर उपचार को लेकर पशुपालकों में जागरूकता भी बढ़ी है.
पशु सखी बनने से श्वेता की केवल आमदनी ही नहीं बढ़ी, बल्कि गांव में उनकी पहचान भी बदल गई. कभी लोग उन्हें केवल परिवार की बहू के रूप में जानते थे. अब बकरियों के बीमार पड़ने या उनकी देखभाल से जुड़ी जरूरत होने पर पशुपालक श्वेता से संपर्क करते हैं. उनकी सलाह पर बकरियों को दवा और टीकाकरण कराने वाले पशुपालक जरूरत पड़ने पर दोबारा उनसे संपर्क करते हैं. लोगों का यही भरोसा उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि बन गया है. श्वेता कहती हैं, “अब लोग हमारी बात समझते हैं और सम्मान के साथ बुलाते हैं.”
पशुओं की सेवा श्वेता के लिए आय का जरिया भी बनी है. करीब एक वर्ष में उन्होंने लगभग 30 हजार रुपये कमाए हैं. इसका इस्तेमाल उन्होंने दवाओं की व्यवस्था के साथ बच्चों की पढ़ाई और घर की जरूरतों को पूरा करने में किया. श्वेता के लिए अपनी कमाई का महत्व केवल रुपये तक सीमित नहीं है. इससे उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों में भागीदारी करने और अपने फैसले लेने का आत्मविश्वास भी मिला है.
श्वेता के लिए पशु सखी बनने की राह आसान नहीं थी. शुरुआत में कई गांवों तक पैदल पहुंचना भी बड़ी चुनौती थी. इसके बावजूद उन्होंने काम जारी रखा. धीरे-धीरे जब पशुपालकों का भरोसा बढ़ा और काम के बेहतर नतीजे सामने आने लगे तो नजरिया भी बदल गया. जिस काम को लेकर शुरुआत में झिझक थी, उसी काम ने श्वेता को गांव में सम्मान और परिवार में आर्थिक भागीदारी का अवसर दिया.
अब श्वेता अपने काम को और आगे बढ़ाना चाहती हैं. उनका सपना अपनी आमदनी बढ़ाकर बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और बेहतर भविष्य तैयार करने का है. साथ ही वह चाहती हैं कि गांव में उनकी पहचान अच्छे काम और पशुपालकों की सेवा के लिए हो. आजीविका मिशन से मिली पशु सखी की जिम्मेदारी ने उनके लिए घर की चौखट से आत्मनिर्भरता तक पहुंचने की नई राह खोल दी है.
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