Success Story: पीला सोना,पक्की कमाई, कुशीनगर के हल्दी किसानों की दमदार कहानी

Success Story: पीला सोना,पक्की कमाई, कुशीनगर के हल्दी किसानों की दमदार कहानी

कुशीनगर के किसानों की हल्दी की कहानी बहुत शानदार है.यह कहानी सिर्फ बैंक के पैसों की नहीं हैयह कहानी उस टूटती उम्मीद के वापस लौटने की है, उस सच्ची मुस्कुराहट की है जो किसान के चेहरे पर तब आती है जब उसकी दिन-रात की मेहनत रंग लाती है. इस जिले पहले वे पुराने बीजों से खेती करते थे, जिससे मुनाफा बहुत कम होता था.

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Success Story: पीला सोना,पक्की कमाई, कुशीनगर के हल्दी किसानों की दमदार कहानीकुशीनगर के किसानों की हल्दी से चमकी किस्मत

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जेिले का ज़िक्र जब भी आता है, तो वहां की पुरानी और मशहूर खेती का ख़याल ज़रूर आता है. करीब आठ दशक से कुशीनगर के हर किसान के खेत में हल्दी की फसल लहलहाती थी. यह हल्दी उनकी आम ज़िंदगी, पूजा-पाठ और पराम्परिक खेती का अहम हिस्सा थी. लेकिन वक़्त के साथ, किसान पुराने और लोकल बीज पर ही निर्भर रह गए। पुरानी तकनीक की वजह से पैदावार गिरकर लगभग 60 क्विंटल प्रति एकड़ तक आने लगी थी. कम मुनाफे और थका देने वाले तरीकों की वजह से किसान निराश होने लगे. वे धीरे-धीरे गन्ना और धान जैसी फसलों की तरफ मुड़ गए.

हल्दी की खेती सिर्फ घर के छोटे-मोटे इस्तेमाल तक सिमट कर रह गई। किसानों की मेहनत तो पूरी थी, पर आमदनी में मुनाफा नहीं था और उनकी ज़िंदगी लगातार मुश्किल होती जा रही थी. ऐसे मायूसी भरे वक़्त में, एक कृषि विकास संस्था सस्टेनेबल ह्यूमन डेवलपमेंट एसोसिएशन (एसएचडीए ) एक ने उम्मीद की नई किरण बनकर कुशीनगर के रामकोला ब्लॉक में कदम रखा.मकसद साफ़ था,किसानों की इस पुरानी खेती को नए तरीके से ज़िंदा करना, ताकि उनकी रोज़ी-रोटी में एक बड़ा और बेहतर बदलाव लाया जा सके.

कामयाबी की पहली सीढ़ी

इस नए सफ़र की शुरुआत आसान नहीं थी, एसएचडीए के सचिव बीएम त्रिपाठी ने बताया कि विशेषज्ञों की टीम ने साल 2015 से 2017 के बीच गांव-गांव जाकर नए बीजों का ट्रायल शुरू किया. जब नतीजे सामने आए, तो सब हैरान रह गए. 'राजेन्द्र सोनिया', 'राजेन्द्र सोनाली', और 'नरेन्द्र हल्दी-1' जैसे नए बीजों ने लोकल बीजों के मुकाबले लगभग दुगनी पैदावार दी. इनकी कामयाबी देखकर, साल 2023 में संस्था ने एक बड़ी मुहिम शुरू की, जिसमें रामकोला ब्लॉक के 10 गाँवों के करीब 1,020 किसान पूरे जोश के साथ शामिल हुए. 

इन किसानों को न सिर्फ 'राजेन्द्र सोनिया' का बेहतरीन बीज दिया गया, बल्कि कृषि विज्ञान केंद्र  के एक्सपर्ट्स के ज़रिए खेती के नए साइंटिफिक तरीके भी सिखाए गए.साथ ही 60 बीज उत्पादकों का मज़बूत नेटवर्क बनाया गया, जहां हर बीज उत्पादक ने 15-16 किसानों की मदद की. इसने किसान को एक समझदार एग्री-एंटरप्रेन्योर बनने का नया रास्ता दिखाया.

नुकसान से शानदार मुनाफे तक का सफ़र

इस बड़े बदलाव की असली कहानी किसानों के अपने तजुर्बे में बसती है, बीएम त्रिपाठी ने बताया जैसे रामपुर बगहा गांव के गामा  पहले सिर्फ 0.05 एकड़ ज़मीन में लोकल हल्दी उगा कर मुश्किल से 1,270 रुपया का मुनाफा कमा पाते थे.जब उन्होंने नई सलाह मानकर 'राजेन्द्र सोनिया' बीज का इस्तेमाल किया, तो ज़िंदगी बिल्कुल बदल गई। सिर्फ दो साल की कड़ी मेहनत से उन्होंने अपनी खेती का दायरा 0.75 एकड़ तक बढ़ाया और मुनाफा 1,93,836 रुपया तक पहुंच गया जो पुराने मुनाफे से 152 गुना ज़्यादा था . 

दूसरी तरफ, बड़हरा बाबू गांव के सुधीर कुशवाहा  का हाल और भी बुरा था, साल2022-23 में उन्हें लोकल हल्दी में  75 रुपया का का नुकसान उठाना पड़ा था. जिसके बाद उन्होंने हल्दी की खेती हमेशा के लिए छोड़ने का मन बना लिया था. पर नई टीम के आने के बाद उन्होंने दोबारा हिम्मत की, तो अगले ही साल 37 क्विंटल की बंपर पैदावार हुई और 54,712 रुपया का शानदार मुनाफा कमाया. जो किसान कल तक मायूस था, आज वह अपने हरे-भरे खेत से दूसरों को कामयाबी का रास्ता दिखा रहा है.

छोटे खेत और बड़ी कमाई जरिया बना

ऐसी ही एक रोशन कहानी देवरिया मानिया छपरा गांव के राधेश्याम और देवरिया बाबू गांव के रामबृक्ष की भी है, जिन्होंने अपने छोटे खेत में बड़े कमाई में बदल दिया. राधेश्याम के पास ज़मीन कम थी और 7 लोगों का परिवार था; पहले वो हल्दी से साल भर में करीब 30,500 रुपया ही कमा पाते थे. लेकिन 'राजेन्द्र सोनिया' बीज और टेक्निकल मदद से, उन्होंने लीज़ पर और ज़मीन ली.दायरा बढ़ाया और आमदनी छलांग लगाकर सीधे1,85,905 रुपये तक पहुंच गई.

 अगर किसी कहानी में सच में जादू दिखता है, तो वह रामबृक्ष की लगन है.एक वक़्त था जब रामबृक्ष को 0.10 एकड़ से सिर्फ 800  रुपये का मुनाफा मिलता था,जो उनकी मेहनत के आगे ना-के-बराबर था. इस नई मुहिम पर भरोसा करके उन्होंने 1.50 एकड़ ज़मीन लीज़ पर ली और पूरे दिल से हल्दी उगाई इस नए तजुर्बे ने उन्हें 2,62,580 रुपया का बंपर मुनाफा दिया! यह सिर्फ आमदनी का बढ़ना नहीं था, यह किसानों के लिए समाज में नई पहचान,आर्थिक आज़ादी और बड़ी इज़्ज़त पाने की बेहतरीन शुरुआत थी.

कुशीनगर में हल्दी ने पलट दी किसानों की तकदीर
कुशीनगर में हल्दी ने पलट दी किसानों की तकदीर

खेती में महिलाओं की ताकत 

खेती-बाड़ी में औरतों की मेहनत हमेशा पर्दे के पीछे छुपी रही है. वे खेतों में खटती तो हैं, पर उन्हें किसान का दर्जा नहीं मिलता. पर इस हल्दी इंकलाब ने कुशीनगर की औरतों को नया मुकाम दिया है. देवरिया मानिया छपरा की श्याम देवी और उनके बेटे बंशी ने साबित कर दिखाया कि माँ की समझ और बेटे की मेहनत मिल कर नए तरीके अपनाएं, तो कामयाबी हर हाल में मिलती है.श्याम देवी की पुरानी खेती से उन्हें सिर्फ 32,400 रूपय़े मिलते थे, पर नए बीज और आधुनिक बारीकियां सीखने के बाद, उनका प्रॉफिट दुगना होकर 85,999 रूपये हो गया. आज श्याम देवी गाँव की मिसाल बन गई हैं, जो दूसरी औरतों को भी रास्ता दिखाती हैं.

ऐसी ही हिम्मत वाली मिसाल अहिरौली कुसुम्ही गांव की सोनमती की है, जो पहले दिन-रात एक करके मुश्किल से 1,300  रुपये कमा पाती थीं.नई ट्रेनिंग और हिम्मत के बाद, उन्होंने 32 क्विंटल हल्दी पैदा की और 67,010 रूपये का ज़बरदस्त मुनाफा कमाया. ये औरतें अब सिर्फ मज़दूर नहीं हैं, बल्कि अहम फैसले लेने वाली शक्तिशाली एग्री-बिज़नेस लीडर्स बन चुकी हैं.

गांव-गांव में बीजों का नया हब

जब किसी साधारण किसान को शानदार कामयाबी मिलती है, तो ख़बर पूरे इलाके में आग की तरह फैल जाती है. कुशीनगर के गांव-गांव में अब यही नज़ारा देखने को मिल रहा है; किसान खुद ही एक-दूसरे के उस्ताद बन गए हैं. रामरक्षा, लालजी, मोतीलाल, रामहरख, जवाहर, अर्जुन, रामचंदर, और धर्मेन्द्र मौर्य जैसे तमाम किसानों की खेती आज बाकी लोगों के लिए एक "लाइव डेमोंस्ट्रेशन" बन गई है. इन किसानों ने पहले नुकसान उठाया था, लेकिन नए बीज और सच्ची गाइडेंस से आज इनकी ज़िंदगी आबाद हो गई है. सबसे ख़ास बात यह है कि ये किसान अब सिर्फ अपने लिए खेती नहीं कर रहे हैं, बल्कि ये लोग अपने गांव के लिए 'लोकल सीड रिसोर्स हब' बन चुके हैं. आस-पास के गांव वाले और व्यापारी सीधे इनके पास आकर अच्छे बीज खरीदते हैं और नए गुण सीखते हैं. केवीके और एसएचडीए के साथ मिलकर इन किसानों ने अपने इलाके में हल्दी का मज़बूत और टिकाऊ बीज सिस्टम खड़ा कर दिया है,जिससे अगली पीढीं  को नया सहारा मिल गया है.

कुशीनगर का हल्दी इंकलाब 

कुशीनगर का यह हल्दी सफ़र अब सच में एक सच्चा "क्रांति का रूप ले चुका है, जिसने किसानों की तक़दीर और उनके खेत की तस्वीर पूरी तरह से बदल कर रख दी है. ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि सिर्फ दो साल के छोटे से वक़्त के अंदर ही पैदावार में 25% का इज़ाफ़ा हुआ है और किसानों की कुल आमदनी में 100 फीसद से ज़्यादा की शानदार बढ़ोतरी हुई है. जिन गरीब किसानों की आमदनी पहले औसतन 51,516 रुपया थी, वह आज आराम से 1,08,968 रुपया तक पहुंच गई है.य

ह कहानी सिर्फ बैंक के पैसों की नहीं है;यह कहानी उस टूटती उम्मीद के वापस लौटने की है, उस सच्ची मुस्कुराहट की है जो किसान के चेहरे पर तब आती है जब उसकी दिन-रात की मेहनत रंग लाती है इस मुहिम ने किसान और मिट्टी का पुराना रिश्ता वापस जोड़ दिया है. लॉर्ड बुद्धा वेजिटेबल प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड' जैसी FPOs के आने से अब फसल बाज़ार में बेचने की परेशानी भी दूर हो रही है. कुशीनगर आज उत्तर भारत का बड़ा, मशहूर और कामयाब हल्दी हब बनने की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा है.

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