मुरादाबाद के बिलारी के रहने वाले थे 'कृषि पंडित' रघुपत सिंहभारत सरकार ने मुरादाबाद के बिलारी तहसील के रहने वाले प्रगतिशील किसान दिवंगत रघुपत सिंह को खेती के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए मरणोपरांत पद्म श्री सम्मान से नवाजा है. यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान उनके द्वारा पारंपरिक खेती को आधुनिक और वैज्ञानिक नजरिया देकर हजारों किसानों का जीवन बदलने के लिए दिया गया है. दुखद बात यह रही कि साल 2021 में कोरोना काल के दौरान उनका निधन हो गया, लेकिन आज उनकी विरासत को उनके बेटे सुरेंद्र पाल सिंह बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं. रघुपत सिंह ने 1980 के दशक से ही खेती को एक नई दिशा देना शुरू कर दिया था, जिसका असर आज पूरे देश के किसानों पर दिख रहा है.
रघुपत सिंह जी का सबसे महत्वपूर्ण काम उन सब्जियों और बीजों को बचाना था, जो आधुनिकता की दौड़ में हमारी थाली से गायब हो चुके थे. उन्होंने लगभग 55 से अधिक ऐसी सब्जियों की किस्मों को फिर से जीवित किया, जिन्हें लोग भूल चुके थे. उन्होंने हार नहीं मानी और गांव-गांव घूमकर पुराने बीजों को इकट्ठा किया और उन्हें अपने खेत में उगाकर फिर से प्रचलन में लाए. उनके पास बीजों का एक ऐसा अनूठा खजाना था, जिसने पुरानी और पौष्टिक फसलों को लुप्त होने से बचा लिया. आज उनके द्वारा संरक्षित किए गए ये बीज नई पीढ़ी के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं.
रघुपत सिंह को लोग सम्मान से 'कृषि पंडित' बुलाते थे. उनकी शोध करने की क्षमता किसी बड़े वैज्ञानिक से कम नहीं थी. उन्होंने बिना किसी बड़ी लैब के, केवल अपने अनुभव और मेहनत से ऐसी फसलें उगाईं जिन्हें देखकर लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते थे. उन्होंने 7 फीट लंबी लौकी, ढाई फुट की सेम और एक ऐसा अनोखा अदरक विकसित किया, जिससे आम जैसी खुशबू और स्वाद आता था. उन्होंने 100 से ज्यादा फसलों की नई प्रजातियां तैयार कीं. उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों से जो भी सीखा, उसे अपने खेत में प्रयोग के तौर पर उतारा और खेती को एक चमत्कार बना दिया. रघुपत सिंह का मानना था कि किसान को केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि 'स्मार्ट वर्क' भी करना चाहिए. उन्होंने अपने जीवनकाल में देश भर के करीब 3 लाख से ज्यादा किसानों को आधुनिक खेती की ट्रेनिंग दी. वे हमेशा मौसम आधारित खेती पर जोर देते थे, ताकि किसानों को नुकसान कम और मुनाफा ज्यादा हो.
रघुपत सिंह की प्रतिभा केवल मुरादाबाद तक सीमित नहीं रही, वे अपनी फसलों से अच्छी गुणवत्ता वाले बीज तैयार करते थे और उन्हें छोटे किसानों में मुफ्त या बहुत कम कीमत पर बांटते थे. उनकी इस निस्वार्थ सेवा ने उन्हें किसानों का सच्चा मसीहा बना दिया था. बल्कि उनकी गूंज दिल्ली तक पहुंची. खेती में उनके शानदार योगदान के लिए उन्हें 11 राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनके नवाचारों और अनोखी फसलों की सराहना कर चुके हैं. वे कहते थे कि किसानों को पारंपरिक खेती की लकीर को छोड़कर कुछ नया सोचना चाहिए. उनकी इसी लगन और तपस्या का परिणाम है कि आज भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म श्री' जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा है, जो हर किसान के लिए गर्व की बात है.
आज भले ही रघुपत सिंह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा सिखाए गए तरीके और उनके विकसित किए गए बीज लाखों घरों में समृद्धि ला रहे हैं. उनका जीवन हमें सिखाता है कि खेती केवल पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि शोध और जिम्मेदारी का विषय है. उनके बेटे सुरेंद्र पाल सिंह आज भी उनके 'बीज बैंक' को संभाल रहे हैं और पिता के सपनों को पूरा कर रहे हैं. रघुपत सिंह का नाम इतिहास में उन लोगों में दर्ज हो गया है, जिन्होंने धरती मां की सेवा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और खेती को एक सम्मानजनक पेशा बनाया.
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