एक मशीन कई काम, किसान का स्मार्ट जुगाड़बिहार के बक्सर जिले के गेरुआबंध गांव के रहने वाले किसान कमलेश पांडेय ने ग्रामीण इलाकों की एक बहुत बड़ी समस्या का बेहद आसान और ज़बरदस्त हल निकाला है. अमूमन देखा जाता है कि रबी के सीजन के बाद किसानों की 'जीरो-टिलेज' मशीनें साल के कई महीनों तक खेतों और दालानों में बेकार पड़ी धूल फांकती रहती हैं. कमलेश ने इस बेकार पड़ी मशीनरी को देखकर एक ख़ास मंसूबा बनाया. उन्होंने अपने इस खाली पड़े ज़ीरो-टिलेज फ्रेम का इस्तेमाल करके एक ऐसी 'मोबाइल ' चलती-फिरती ग्रेन प्रोसेसिंग यूनिट मशीन तैयार कर दी, जिसने न सिर्फ़ कमाई बढ़ी बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी सहूलियत का एक नया रास्ता खोल दिया. इस पूरी यूनिट को ट्रैक्टर के पीछे आसानी से बांधकर किसी भी खेत या गांव के चौक-चौराहे तक ले जाया जा सकता है. इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत इसकी बहुआयामी क्षमता है. सिर्फ छलनी बदलकर इससे धान की कुटाई और गेहूं की सफाई दोनों काम किए जा सकते हैं.
कमलेश पांडेय ने अपनी इस नायाब तरकीब के तहत ज़ीरो-टिलेज फ्रेम के एक छोर पर राइस हालर यानी धान कूटने वाली मशी को फ़िक्स कर दिया और फ्रेम के दूसरे छोर पर 5 HP की एक दमदार इलेक्ट्रिक मोटर लगा दी. इन दोनों मशीनों को आपस में जोड़ने के लिए उन्होंने एक मजबूत कन्वेयर बेल्ट और पुली सिस्टमका इस्तेमाल किया. इस महारत के साथ उन्होंने एक भारी-भरकम और स्थिर रहने वाली मशीन को एक गतिशील यूनिट में तब्दील कर दिया. अब इस पूरी मशीनरी को एक ट्रैक्टर के पीछे आसानी से जोड़कर किसी भी खेत, खलिहान या गाँव के चौक-चौराहे तक ले जाया जा सकता है. जहाँ बिजली की उपलब्धता हो, वहाँ इसे फ़ौरन चालू करके काम शुरू किया जा सकता है.
इस कमाल की मशीन की सबसे बड़ी ख़ासियत इसकी बहुआयामी उपयोगिता है. यह मशीन सिर्फ़ धान कूटने तक ही सीमीत नहीं है. कमलेश ने इसमें एक ऐसा स्मार्ट सिस्टम बनाया है कि सिर्फ़ इसकी छलनी को बदलकर, इसी मशीन का इस्तेमाल गेहूं की सफ़ाई के लिए भी किया जा सकता है. यह मशीन गेहूं के दानों को बिना कोई नुक़सान पहुँचाए, उनमें से खरपतवार के बीज, छोटे या कमज़ोर दाने और हर तरह के कचरे को बिल्कुल अलग कर देती है. इस पूरी यूनिट की प्रोसेसिंग क्षमता 200 किलोग्राम प्रति घंटा है, और सबसे हैरतअंगेज़ बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए सिर्फ़ एक ही आदमी की ज़रूरत होती है.
इस देसी और सुलभ आविष्कार ने कमलेश की आमदनी में इज़ाफ़ा करने में एक बेहद अहम रोल अदा किया है. इस मोबाइल यूनिट को किराए पर चलाकर और दूसरों का अनाज प्रोसेस करके वे सालाना तक़रीबन ₹42,000 की शुद्ध कमाई कर रहे हैं. इसके अलावा, धान की कुटाई के दौरान जो सह-उत्पाद जैसे कि धान का छिलका (husk) और चोकर (bran) निकलता है, उसे बाज़ार में बेचकर उन्हें हर साल लगभग ₹12,500 की अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है. चूंकि बक्सर और आसपास का पूरा इलाका 'धान-गेहूँ फसल चक्र' के तहत आता है, इसलिए इस मशीन की मांग साल के बारह महीने बनी रहती है. इससे न सिर्फ़ वक़्त की बचत होती है बल्कि ढुलाई और मज़दूरी का खर्च भी आधा रह जाता है.
कमलेश पांडेय के इस कामयाब तजुर्बे को बड़े पैमाने परफैलाने की भरपूर जरूरत है. ख़ास तौर पर उन सहकारी समितियों और किसान समूहों के लिए यह एक कमाई का बेहतर साधन साबित हो सकता है, जिनके पास महंगे पोस्ट-हार्वेस्ट उपकरण खरीदने का बजट नहीं होता. हालाँकि, इस तकनीक को और ज़्यादा महफ़ूज बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा इसके वैज्ञानिक मुल्याकन की जरूरत है. अगर वैज्ञानिक इसके टिकाऊपन सुरक्षा मानकों और बिजली की खपत का सही मूल्यांकन करके इसे थोड़ा और रिफ़ाइन कर दें, तो भारत के ग्रामीण इलाक़ों में बेकार पड़ी कृषि मशीनरी के सही इस्तेमाल और किसानों की आत्मनिर्भरता के लिए यह तकनीक लाभदायक साबित होगी.
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