
मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के कुण्डम विकासखंड का छोटा सा आदिवासी गांव सिलाइया आज महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण उद्यमिता का प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है. कभी केवल पारंपरिक टोकरी और सूपा बनाकर घरेलू जरूरतें पूरी करने वाली यहां की महिलाएं अब बांस शिल्प को आधुनिक स्वरूप देकर हजारों रुपये की आय अर्जित कर रही हैं.नाबार्ड के सहयोग से शुरू हुई इस पहल ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत की है, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास और सामाजिक पहचान भी दिलाई है.
सिलाइया गांव की 90 आदिवासी महिलाओं के जीवन में बदलाव की शुरुआत नाबार्ड द्वारा संचालित ‘आजीविका एवं उद्यम विकास कार्यक्रम’ से हुई. इस कार्यक्रम के तहत महिलाओं को बांस शिल्प की आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया. लोक कल्याण भूमिका समिति के मार्गदर्शन में महिलाओं ने अपनी पारंपरिक कला को नए डिजाइनों और आधुनिक उत्पादों से जोड़ा.
प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने फ्लावर पॉट, थ्री-डी ग्रीटिंग कार्ड, सजावटी जहाज, लैंप, शोपीस, कुर्सियां, टेबल और अन्य आकर्षक हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करना शुरू किया. इन उत्पादों की गुणवत्ता और डिजाइन ने बाजार में तेजी से पहचान बनाई.
नाबार्ड की जिला विकास प्रबंधक देविना मेहरोत्रा के अनुसार बांस शिल्प ग्रामीण महिलाओं के लिए बेहद लाभकारी व्यवसाय साबित हो रहा है. उन्होंने बताया कि लगभग 200 रुपये कीमत के एक बांस से दो से तीन सजावटी वस्तुएं तैयार हो जाती हैं, जिनकी बाजार में कीमत 700 से 800 रुपये तक मिलती है.
इसी प्रकार दो बांसों से तैयार फर्नीचर सेट 2 हजार से 3 हजार रुपये तक में बिक जाता है. इससे महिलाओं की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव आया है.
इस परियोजना को सफल बनाने के लिए नाबार्ड ने 10 लाख रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की. इस राशि का उपयोग महिलाओं को प्रशिक्षण देने, आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने, कच्चे माल की व्यवस्था करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में किया गया.
लोक कल्याण भूमिका समिति की अध्यक्ष रेखा कुशवाहा बताती हैं कि इस परियोजना का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं था, बल्कि महिलाओं को ऐसा कौशल प्रदान करना था जिससे वे लंबे समय तक स्वरोजगार से जुड़कर स्थायी आय अर्जित कर सकें.
प्रशिक्षण के बाद सबसे बड़ी चुनौती उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने की थी. इसके लिए महिलाओं को भोपाल, जबलपुर, छिंदवाड़ा और अन्य शहरों में आयोजित मेलों, प्रदर्शनियों तथा हस्तशिल्प आयोजनों से जोड़ा गया.
आज स्थिति यह है कि जो महिलाएं पहले गांव की सीमाओं तक सीमित थीं, वे अब बड़े शहरों में जाकर अपने उत्पादों का प्रदर्शन और विक्रय कर रही हैं. इससे उनकी आय के साथ-साथ आत्मविश्वास भी बढ़ा है.
बांस शिल्प से जुड़ने के बाद महिलाओं की भूमिका केवल परिवार तक सीमित नहीं रही. अब वे आर्थिक निर्णयों में भागीदारी कर रही हैं, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से कारोबार संचालित कर रही हैं और अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही हैं.
यह पहल साबित करती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को उचित प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो वे स्थानीय संसाधनों के आधार पर सफल उद्यमी बन सकती हैं.
सिलाइया गांव की यह सफलता केवल बांस शिल्प की कहानी नहीं है, बल्कि ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है. यहां की आदिवासी महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा और मेहनत को सही दिशा मिले तो गांवों से भी आर्थिक क्रांति की शुरुआत हो सकती है.आज सिलाइया की महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं और उनकी यह सफलता प्रदेश के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बनकर उभर रही है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today