बंगाल चुनाव में छाए किसानों के ये मुद्दे (AI- तस्वीर)पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे किसानों से जुड़े मुद्दों पर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मी तेज होती जा रही है. दरअसल, बंगाल की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है, बंगाल में सत्ता की लड़ाई अक्सर खेत, फसल और जमीन के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. इस बार भी वही तस्वीर उभरती दिख रही है. हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्य की ममता बनर्जी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह राजनीतिक कारणों से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन जैसी केंद्र सरकार की योजनाओं को लागू नहीं कर रही हैं. उनका कहना है कि इससे राज्य के किसानों को सीधा नुकसान हो रहा है. इसके अलावा भी बंगाल की मुख्य फसल आलू के किसानों का मुद्दा भी काफी अहम है.
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान बंगाल चुनाव में किसानों के मुद्दों को उठाते हुए ये वादा किया है कि अगर राज्य में भाजपा की सरकार बनती है, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन जैसी केंद्र सरकार की योजनाओं को पूरी तरह लागू कर किसानों को उनका हक दिलाया जाएगा. वहीं, दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है. पार्टी का कहना है कि राज्य सरकार अपने स्तर पर किसानों के लिए कई योजनाएं चला रही है और उन्हें हर संभव मदद दी जा रही है. ममता बनर्जी की सरकार लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है और उनका राजनीतिक आधार भी काफी हद तक ग्रामीण और किसान वर्ग पर ही टिका हुआ है.
बता दें कि बंगाल की राजनीति में किसान और जमीन का मुद्दा ऐतिहासिक रूप से काफी अहम रहा है. दरअसल, साल 2011 में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा के 34 साल पुराने शासन को खत्म करते हुए सत्ता हासिल की थी, और उस समय भी किसानों के हितों को लेकर बड़ा आंदोलन देखने को मिला था. सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों ने न सिर्फ राज्य की राजनीति को बदला, बल्कि पूरे देश में जमीन अधिग्रहण और किसानों के अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी थी.
अब 2026 के चुनावी माहौल में वही पुराने मुद्दे एक बार फिर सामने आ रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार किसानों की समस्याएं और भी बढ़ गई हैं. राज्य के कई हिस्सों में पिछले दिनों हुए बेमौसम बारिश और जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर साफ दिखाई दे रहा है. हाल के दिनों में मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में आलू और अन्य फसलों को भारी नुकसान हुआ है. ऐसे में किसानों का कहना है कि मौसम में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव के कारण उनकी आय पर असर पड़ रहा है. इसके अलावा डीजल, खाद और बीज की कीमतों में इजाफा होने से किसानों की लागत बढ़ गई है, जबकि उन्हें उपज का उचित दाम नहीं मिल रहा है. खासकर छोटे और सीमांत किसान पर इसका सबसे ज्यादा असर है. राज्य में धान और आलू प्रमुख फसलें हैं, लेकिन इनके बाजार के कीमतों में उतार-चढ़ाव किसानों के लिए चिंता का कारण बना हुआ है.
फसल बीमा योजना को लेकर भी राज्य और केंद्र के बीच टकराव जारी है. कई किसान ऐसे हैं जिन्हें प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी मुआवजा नहीं मिलता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो रही है. वहीं, प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को लेकर भी अब धीरे-धीरे चर्चा बढ़ रही है, लेकिन इसके लिए जरूरी प्रशिक्षण और संसाधनों की कमी अभी भी चुनौती बनी हुई है.
वहीं, चुनाव कि तैयारी में तेजी से जुटते हुए तृणमूल कांग्रेस ने अपना मेनिफेस्टो जारी कर दिया है, जिसमें किसानों को लेकर कई बड़े वादे किए गए हैं.
1. विशेष कृषि-बजट: अगले पांच सालों के लिए 10 वादों वाले रोडमैप के हिस्से के तौर पर ममता बनर्जी ने 30,000 करोड़ रुपये का एक विशेष बजट घोषित किया है.
2. जमीन-विहीन मजदूरों को सहायता: जमीन-विहीन खेतिहर मजदूरों को सालाना 4,000 रुपये मिलेंगे, जो रबी और खरीफ मौसमों के लिए दो किस्तों में दिए जाएंगे.
3. सिंचाई में सहायता: सरकार द्वारा चलाए जा रहे ट्यूबवेल और रिवर लिफ्ट सिंचाई (RLI) योजनाओं के तहत सिंचाई की सभी फीस माफ कर दी जाएगी.
4. फसलों की सुरक्षा और फायदे: राज्य सरकार ने बताया कि 'बांग्ला शस्य बीमा' (फसल बीमा) योजना के तहत 1.13 करोड़ किसानों को पहले ही 3,938 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है, जिसमें किसानों के कल्याण को प्राथमिकता दी गई है.
इन पहलों का मकसद खेती के क्षेत्र की प्रगति और सहायता को बनाए रखना है, जिसमें ज्यादा कीमत वाली फसलों और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर खास जोर दिया गया है.
राजनीतिक दल इन सभी मुद्दों को अपने-अपने तरीके से उठा रहे हैं. भाजपा जहां केंद्र की योजनाओं को लागू न होने का मुद्दा बना रही है. वहीं, तृणमूल कांग्रेस राज्य सरकार की योजनाओं और सब्सिडी को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है. हर रैली और भाषण में किसान, फसल और जमीन का जिक्र जरूर होता है, क्योंकि यही वो वर्ग है जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखता है.
ऐसे में पश्चिम बंगाल में चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएंगे, इन मुद्दों पर बयानबाजी और तेज होगी. लेकिन असली सवाल यही है कि चुनावी वादों और आरोप-प्रत्यारोप के बीच किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान कब और कैसे होगा. फिलहाल, बंगाल का किसान एक बार फिर सियासत के केंद्र में है, और उसकी उम्मीदें उन वादों पर टिकी हैं जो चुनावी मंचों से किए जा रहे हैं या पार्टियों के मेनिफेस्टो में जारी किए जा रहे हैं.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today