गेहूं की 4 ऐसी किस्में जो गंभीर बीमारियों में भी देती हैं राहत, ये रही पूरी डिटेल्स

गेहूं की 4 ऐसी किस्में जो गंभीर बीमारियों में भी देती हैं राहत, ये रही पूरी डिटेल्स

इन किस्मों में सोना मोती विश्व स्तर पर एकमात्र फोलिक एसिड युक्त गेहूं है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें ग्लूटेन सामग्री और ग्लाइसेमिक इंडेक्स की मात्रा काफी कम होती है. इसी तरह, खपली गेहूं ग्लूटेन-मुक्त और फाइबर युक्त होने के कारण अपनी अलग पहचान रखता है.

Advertisement
गेहूं की 4 ऐसी किस्में जो गंभीर बीमारियों में भी देती हैं राहत, ये रही पूरी डिटेल्सये हैं गेहूं की पारंपरिक किस्में. (सांकेतिक फोटो)

हिमाचल प्रदेश में किसान गेहूं की परंपरागत किस्मों की खेती करेंगे. इसके लिए कृषि विभाग विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी गेहूं की पारंपरिक किस्मों को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है. प्रदेश सरकार का मानना है कि गेहूं की परंपरागत किस्में स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होती हैं. इनका नियमित सेवन करने से बीमारियों से लड़ने की क्षमता में शरीर में बढ़ जाती है. सोना मोती, बंसी, शस्त्राती और खपली गेहूं की परंपारगत किस्में हैं, जो लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं. क्योंकि उनके बीज तेजी से मार्केट से गायब हो गए हैं. विशेषज्ञों का कहा है कि इन किस्मों के आटे से बनी रोटी खाने से हृदय रोगों से राहत मिलती है. साथ ही यह डायबिटीज और किडनी से संबंधित बीमारियों से बचाव होता है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इन किस्मों में सोना मोती विश्व स्तर पर एकमात्र फोलिक एसिड युक्त गेहूं है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें ग्लूटेन सामग्री और ग्लाइसेमिक इंडेक्स की मात्रा काफी कम होती है. इसी तरह, खपली गेहूं ग्लूटेन-मुक्त और फाइबर युक्त होने के कारण अपनी अलग पहचान रखता है, जो हृदय रोग, मधुमेह और कब्ज के लिए फायदेमंद है. दशकों पहले, गेहूं की ये किस्में की खेती सिरमौर, कुल्लू, चंबा, बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा और शिमला जिले में की जाती थी. लेकिन वे संकर किस्मों के आने के चलते मार्केट से गायब हो गईं. अधिक पैदावार के लालच में किसानों ने इनकी खेती छोड़ दी. 

ये भी पढ़ें- सूरजमुखी की अधिक पैदावार लेने के लिए क्या करें किसान? खेत में कौन सी खाद डालें?

क्या है कृषि विभाग की तैयारी

कृषि विभाग के उप निदेशक राजेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा कि हम इन किस्मों की खोज कर रहे हैं. इनके बीजों को संरक्षित किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि कृषि विभाग इन किस्मों की खेती, उनके संरक्षण और प्रसार को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है. यह पहल कृषि जैव विविधता की रक्षा करने और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने का प्रयास करती है. सोलन जिले के किसान नंद लाल ने कहा कि गेहूं की पुरानी किस्मों को पुनर्जीवित और विकसित करने के कृषि विभाग के प्रयास कृषि विरासत और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति सराहनीय प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.

इतने हेक्टेयर में गेहूं की बुवाई

हिमाचल की अर्थव्यवस्था को चलाने में कृषि सेक्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. राज्य के लगभग 57.03 प्रतिशत कार्यबल सीधे इस क्षेत्र में कार्यरत हैं. 55,673 वर्ग किलोमीटर में फैले हिमाचल में किसान  9.44 लाख हेक्टेयर खेती-किसानी करते हैं. ऐसे कांगड़ा, ऊना मंडी, हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन और सिरमौर जिले में किसान सबसे अधिक रकबे में गेहूं की खेती करते हैं. लेकिन इस साल मंडी, ऊना, हमीरपुर,चंबा और कांगड़ा में गेहूं के बुआई क्षेत्र में बड़ी कमी हुई है. इस क्षेत्र में पिछले दो साल में 31,500 हेक्टेयर में गेहूं की बुआई हुई थी. हालांकि, इस वर्ष उत्तरी क्षेत्र में गेहूं की खेती का क्षेत्रफल 7,500 हेक्टेयर कम हो गया.

ये भी पढ़ें- पशुओं की पसंद हैं ये दो चारे, जानिए क्या है इनकी खासियत और खेती का तौर तरीका 

 

POST A COMMENT