मिडिल ईस्ट तनाव का असर, मुंबई से विदेश भेजे गए फल-सब्जियों के कंटेनर वापस लौटे

मिडिल ईस्ट तनाव का असर, मुंबई से विदेश भेजे गए फल-सब्जियों के कंटेनर वापस लौटे

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों में बाधा के कारण नासिक से भेजे गए अंगूर और केले के कई कंटेनर पोर्ट पर फंस गए हैं या वापस लौट आए हैं. शिपिंग कंपनियों के वॉर रिस्क सरचार्ज और एक्सपोर्ट रुकने से किसानों और एक्सपोर्टरों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है. इससे फलों की कीमतों और व्यापार पर भी असर पड़ा है.

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मिडिल ईस्ट तनाव का असर, मुंबई से विदेश भेजे गए फल-सब्जियों के कंटेनर वापस लौटेईरान युद्ध से अंगूर के निर्यात पर असर

अमेरिका इज़राइल ईरान के बीच चल रहे युद्ध का असर अब भारत के किसानों पर भी दिखाई देने लगा है. अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते विवाद के कारण समुद्री रास्तों पर परेशानी बढ़ गई है. इससे इंटरनेशनल शिपिंग और व्यापार प्रभावित हुआ है. इसका सीधा असर महाराष्ट्र के नासिक जिले के उन किसानों और एक्सपोर्टरों पर पड़ रहा है जो अंगूर और केले को विदेशों में भेजते हैं. कई कंटेनर जो जवाहरलाल नेहरू पोर्ट यानी JNPT से विदेशों के लिए निकले थे, अब वापस भारत लौट रहे हैं. इससे किसानों और व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.

पोर्ट पर फंसे सैकड़ों कंटेनर

पिछले करीब 12 दिनों से युद्ध जैसे हालात के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार धीमा हो गया है. इंडियन हॉर्टिकल्चर एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अनुसार 350 से ज्यादा कंटेनर, जिनमें जल्दी खराब होने वाले फल और सब्जियां थीं, अलग-अलग पोर्ट पर फंस गए. कुछ कंटेनरों को दुबई के दूसरे पोर्ट की तरफ भेजने की कोशिश की गई, लेकिन वहां भी बहुत ज्यादा लोड होने की वजह से परेशानी बढ़ गई. कई कंटेनर वापस बुला लिए गए और कुछ को दूसरे भारतीय पोर्ट पर उतार दिया गया.

नासिक के अंगूर वापस लौटे

नासिक से दुबई के लिए भेजे गए अंगूर के चार कंटेनर भी वापस लौट आए हैं. इन कंटेनरों में करीब 13 मीट्रिक टन अंगूर भरे थे. इन्हें निफाड़ के एक कोल्ड स्टोरेज में फिर से उतारना पड़ा. अंगूर जल्दी खराब होने वाला फल होता है, इसलिए इसे समय पर बाजार तक पहुंचाना बहुत जरूरी होता है. लेकिन देरी होने से अंगूर खराब होने का डर बढ़ गया है. एक्सपोर्टर अक्षय सांगले के अनुसार हर कंटेनर पर लगभग 2 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है.

कोल्ड स्टोरेज और खर्च की बढ़ती समस्या

कंटेनर वापस आने से एक्सपोर्टरों के सामने नई समस्या खड़ी हो गई है. पहले से भरे हुए कोल्ड स्टोरेज में माल रखने की जगह कम पड़ रही है. इसके अलावा मजदूरी, बिजली और ट्रांसपोर्ट का खर्च भी बढ़ रहा है. इस वजह से एक्सपोर्टर और कोल्ड स्टोरेज मालिक दोनों ही मुश्किल में हैं.

केले के व्यापार पर भी संकट

अंगूर के साथ-साथ केले का व्यापार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है. नासिक के एक एक्सपोर्टर संदीप अग्रहरी के 36 कंटेनर अलग-अलग जगहों पर फंसे हुए हैं. कुछ कंटेनर JNPT पोर्ट पर हैं, कुछ रास्ते में हैं और कुछ दूसरे पोर्ट पर उतार दिए गए हैं. इन कंटेनरों को वापस लाने और कोल्ड स्टोरेज में रखने में करीब एक लाख रुपये तक का अतिरिक्त खर्च आ रहा है.

शिपिंग कंपनियों का नया सरचार्ज

मौजूदा हालात में शिपिंग कंपनियों ने “वॉर रिस्क चार्ज” भी लगा दिया है. पहले यह चार्ज नहीं था, लेकिन अब 20 फुट कंटेनर पर लगभग 2000 डॉलर, 40 फुट कंटेनर पर 3000 डॉलर और रीफर कंटेनर पर 4000 डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क लिया जा रहा है. इससे एक्सपोर्ट की लागत अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई है.

किसानों पर पड़ रहा सीधा असर

एक्सपोर्ट रुकने से फलों की कीमतें भी गिरने लगी हैं. पहले केले का एक्सपोर्ट रेट करीब 21 रुपये प्रति किलो था, लेकिन अब यह घटकर लगभग 13 रुपये प्रति किलो रह गया है. इसका सीधा नुकसान किसानों को हो रहा है, क्योंकि उन्हें अपनी फसल कम दाम पर बेचनी पड़ रही है.

पहले से ही कम हुआ था उत्पादन

नासिक दुनिया के बड़े अंगूर उत्पादक क्षेत्रों में से एक है. हर साल यहां से हजारों टन अंगूर यूरोप और खाड़ी देशों में भेजे जाते हैं. लेकिन पिछले साल की बेमौसम बारिश से उत्पादन पहले ही 60 से 70 प्रतिशत तक कम हो गया था. अब जब किसान धीरे-धीरे संभलने की कोशिश कर रहे थे, तभी युद्ध के हालात ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.

किसानों और एक्सपोर्टरों की चिंता

एक्सपोर्टर और किसान अब सरकार से मदद की उम्मीद कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर जल्दी कोई समाधान नहीं निकला, तो उन्हें करोड़ों रुपये का नुकसान हो सकता है. फिलहाल सभी की नजर इस बात पर है कि कब हालात सामान्य होंगे और भारत का फल एक्सपोर्ट फिर से पहले की तरह शुरू हो पाएगा. (प्रवीण बी ठाकरे का इनपुट)

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